Wednesday, June 15, 2011


    शिव महा पुराण (संक्षिप्त और काव्य रूपान्तर)
धरती करती है पैदा सबको,
जल सबको सिथ्त करता  है
वायु से मिलता है प्राण सबको,
अग्नि से सब जल जाता है
आकाश देता है  ओट सबको, 
और इन पांचो का सहयोग ही प्रभु की सृष्टि बनाता  है
ब्रह्मा जी करते है सृजुन सबका,
 भगवान विष्णु जी सृष्टि चलाते है
भगवान रूद्र करते है संहार,
और भगवान महेश्वर तिरोभाव दिखाते है
पर अनुग्रह पर है अधिकार सिर्फ परमात्मा शिव का
और जीव पर अनुग्रह सिर्फ वो ही कर पाते है
ॐ को कहते है प्रणव क्योंकि प्र हें प्रतीक प्रकृति का
नव से बनती है नाव और चढकर इस प्रणव की नाव पर ही
 जीव इस जीवन नदिया के पार जा पाते  है
अ है प्रतीक आकार का (भगवान ब्रह्मा, पृथ्वी)
ऊ से होता है उकार (भगवान विष्णु, जल)
म दिखाता है मकार को (भगवान रूद्र, अग्नि)
बिंदु हें प्रतीक शक्ति का (भगवान महेश्वर, वायु )
और नाद( परमात्मा शिव, आकाश) को परमात्मा शिव का प्रतीक कहते है
ॐ है सूक्ष्म प्रणव, नम: शिवाय है स्थूल प्रणव
जो करे कामना से अराधना,
लेना होगा आश्रय उसे स्थूल प्रणव का
जो है करते  भक्ति निष्काम भाव से
सिर्फ वो सूक्ष्म प्रणव की आराधना पर अधिकार पाते  है
जब की आरम्भ सृष्टि तब शिव से शक्ति का रूप धारण किया
शिव ही शक्ति है और शक्ति ही शिव है 
इस बात को उन्होंने  प्रमाणित किया
शिव लिंग के आधार में है शक्ति
और आधार में सिथ्त है लिंग
शिव और शक्ति अभिन्न है
इस बात का संकेत शिव लिंग है
शिव ने नारी के रूप में शक्ति को प्रगट कराया
और शक्ति के नारी रूप  को
अपना आधा शरीर बनाया
इसी लिए ये रूप शिव का अर्ध नारीश्वर कहलाया
अपने बाये अंग से उत्पन्न किया भगवान विष्णु को
भगवान विष्णु ने तपस्या की घनघोर
और की तपस्या इतनी की
शरीर में चारो ओर से नीर निकल आया
इसीलिए उनका एक नाम नारायण कहलाया
सोये उस जल में  और वही पर उन्होंने  अपना आसन लगाया
और तभी नाभि से उनकी एक कमल अचानक निकल आया
उस कमल के मध्य से निकले भगवान ब्रह्मा जी
जब नही देखा अपने जनक को तो उनका मन भरमाया
उस कमल की नाल पर उपर नीचे खूब उन्होंने चक्र लगाया
नही आया जब समझ तो आकाशवाणी ने समझाया
करो तपस्या येही है एक रास्ता जो उसने बताया
तब की कठोर तपस्या और उसका ये फल पाया
हुए दर्शन भगवान विष्णु के
और इस तरह उनको अपने जन्म का सच समझ आया
तभी एक नाद हुआ
और अग्नि का लिंग प्रगट हुआ
हुए अचम्भित दोनों कि
है ये क्या जो कभी देखा न सुना
कभी उपर कभी नीचे दोनों जाते थे
पर है ये क्या
और कहां है इस लिंग का आदि अंत
ये वो दोनों समझ न पाते थे
देख उनको हैरान परेशान
हुए प्रगट संगनी(शक्ति) के संग महेशान
होकर प्रगट राज उनको बतलाया
की वो ही है शिव
जिन का न है कोई आदि
और न ही है कोई अंत
ये सच उनको समझाया
ब्रह्मा,विष्णु,रूद्र,महेश और शिव
सब नाम है परमात्मा सदाशिव के
ये वो ही है जो 
साकार और निराकार रूप में नजर आते  है
और कल्प के अंत में ये सब सृष्टि समेत
परमात्मा सदाशिव में ही समा जाते है
दे भगवान ब्रह्मा जी का हाथ
भगवान विष्णु के हाथ में
परमात्मा सदा शिव ने भगवान ब्रह्मा को ये बताया
की करनी है पैदा सृष्टि तुमको
और भगवान विष्णु को ये चलानी है
जब आयेगा अंत तब
भगवान रूद्र को ये सब जलानी है
कहकर ये सब परमात्मा सदा शिव वहा से अंतर्ध्यान हुए
और देकर आशीर्वाद और आश्वासन भगवान ब्रह्मा को
भगवान विष्णु भी बैकुंठ धाम को गये ,
ब्रह्मा जी ने शुरू की सृष्टि और
हाथ में जब जल ले उसे उपर की और चढ़ाया
तब प्रगट हुआ एक २४ तत्व का सुनेहरा अंडा
जो था जड ब्रह्मा जी ने ये पाया
घबराकर उनको भगवान विष्णु जी का नाम याद आया
आये विष्णु जी और करके प्रवेश  उस अंडे में
उस अंडे को तब उन्होंने चेतन कराया
करने को चेतन उसको था विराज रूप  अपनाया
येही रूप भगवान विष्णु का विराज रूप कहलाया
अब ब्रह्मा जी ने तामसिक सृष्टि सबसे पहले बनाई थी
फिर स्थावर और जंगम (पेड़, पौधे) कि बारी आई थी
फिर बने प्राणी त्रिस्योक्र्ता सर्ग (पशु, पक्षी जो वायु कि तरह तिरछे चलते है) के
फिर उद्मसर्ग (देवता) की सृष्टि बनाई थी
पर नही था पुरुषार्थ उनमे से किसी में
अब ये बात उनके सामने आई थी
तब जरूरत थी अवर्क्स्रोता सर्ग की जो करे पुरुषार्थ
इसीलिए इस सर्ग में मानव सृष्टि बनाई थी
फिर बने भूत इत्यादि
और इस तरह ये सम्पूर्ण सृष्टि बनाई थी
ब्रह्मा जी ने उत्पन्न किये थे मानस पुत्र
और उनको सृष्टि चलाने की जिम्मेदारी समझाई थी
पर बिना मैथुनी जीवो के ये सृष्टि बड़ नही पाई थी
जब मैथुनी सृष्टि के लिए काम देव का अवतार हुआ
तब ही इस सृष्टि का आगे विस्तार हुआ
ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष को जब प्रजापति पद प्राप्त हुआ
तब होनी के अधीन अपने आप  पर उनको अभिमान हुआ
तब एक महा यज्ञ    का आह्वान  किया
नही बुलाया अपने दामाद भगवान रूद्र (शिव) को
और इस तरह उनका  अपमान किया
तब देवी सती (भगवान रूद्र की पत्नी) को क्रोध आया
और जाकर उन्होंने वहां पर सब उपस्थित
ऋषि, देवताओ, और अपने पिता को
खूब उन्होंने  खरा खोटा सुनाया
फिर जब नही माने दक्ष
तो देवी सती ने करके पश्चाताप
खुद को अग्नि की गोद में जा  समाया
अग्नि में समाकर देवी सती ने खुद को
भगवान शिव को सम्मानित  किया
और शिव ही है शक्ति और शक्ति ही है शिव
इस बात को उन्होंने प्रमाणित किया
सुनकर यह बात भगवान शिव को गुस्सा आया था
और भेजकर वीरभद्र और अपनी अन्य शक्तियों को
उस यज्ञ स्थल पर तांडव वहां पर करवाया था
मार के प्रजा पति दक्ष को
सब देवताओ को वहां से जब भगा दिया
तब सब देवताओ सहित पहुंचे
भगवान विष्णु भगवान रूद्र के पास
और उनके गुस्से को उन्होंने शांत किया
होकर शान्त प्रभु रूद्र ने
 दक्ष को फिर से जीवित किया
पर आदमी की जगह प्रजापति दक्ष के धड़ पर
बकरे का सर लगा दिया
साथ ही इसके द्वारा उन्होंने जग को ये समझाया
कि ब्रह्मा,विष्णु और रूद्र है एक
और है ये  रूप परमात्मा शिव के जग को ये बताया
फिर जा कैलाश पर भगवान शिव ने समाधि लगाई
साल बीते युग बीते पर भगवान शिव ने न नजर घुमाई
तब देवताओ की प्रार्थना पर
माँ आदिशक्ति हिमालय पत्नी माँ मेना की गोद में आई
और माँ मेना को श्राप से मुक्ति करवाई
है ये कहानी तब की जब भगवान ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचाई थी
और तीन मानस पुत्रियों को विष्णु लोक की राह दिखाई थी
तभी हुई लीला और
अवतार पुरुष सन्नत  कुमार का वहां आना हुआ
तीनो पुत्रियों का सम्मान में उनके
न  खड़ा होना एक बहाना हुआ
हो क्रोधित उन्होंने उन तीनो को ये श्राप दिया
और उन तीनो को मृत्यु लोक में जन्म लेने का दंड दिया
बाद में विनय करने पर जब ऋषि प्रसन्न हुए
और उनको  उनकी उस श्राप से मुक्ति के उपाय कहे
तब उनमे से एक हिमालय की पत्नी मेना बनी
और देकर जन्म माँ शक्ति पार्वती को
अपने दोष की उन्होंने निर्वृति करी
दूसरी बहन  माता सीता बनी और
देकर साथ प्रभु राम का विश्व में एक अदभुत लीला रची
तीसरी भगवान कृष्ण की राधा बनी
रसाई रास प्रभु संग
और ऋषि श्राप की इज्जत रखी
उधर जब भोले भंडारी नही जागे समाधि से
तो जा पहुंचे सब देवता माँ शक्ति की शरण में
जोडकर हाथ अपनी विनती उनके सामने रखी
की प्रार्थना उनसे कि
भगवान शंकर जी के समाधि से
उठने का उचित समय है  ये ही
मानी उनकी बात और माँ आदि शक्ति ने
रूप धर पार्वती का रानी मेना के गर्भ में प्रवेश किया
बनी पार्वती और और माँ बनाकर
महारानी मेना का जीवन उन्होंने सफल किया
हुई जब बड़ी देवी पार्वती तो
भगवान शंकर करने तपस्या हिमालय पर आये
मांगने को स्थान तपस्या का
हिमालय राज के पास नंदीजी बनाकर दूत भिजवाये
देकर स्थान हिमालय राज कृतार्थ हुए
और लेकर साथ अपनी पुत्री देवी पार्वती को
करने को सेवा भगवान शंकर के समक्ष आये
मांगी आज्ञा कि  देवी पार्वती को संग दो सखियों के
सेवा करने  की आज्ञा की प्रधान करो
और करो कृतार्थ हमे
और हम सबका जीवन सफल करो
इस पर देने को उपदेश योगियो को शंकर जी थे मुस्कराए
और मुस्करा कर वो प्रस्ताव अस्वीकार कर ये वचन फरमाए
स्त्री सिर्फ माँ के रूप में छाया है
बाकी तो सब माया है
करनी है सच्ची तपस्या  तो स्त्री से दूर रहो
करो ब्रह्मचर्य का पालन और सदा ध्यान में मग्न रहो
स्त्री का साथ साधना भंग कराता है
और विषय वासना की ओर
 जीव को धकेलकर ले जाता है
हालाँकि भगवान शंकर तो
निर्विकार परमात्मा स्वरूप है
मगर दिखाने को योगियो को सही राह
ये लीला करने  को मजबूर है
तब बोली देवी पार्वती कि
आपकी शक्ति  भी  तो प्रकृति है
प्रकृति के साथ ही आप साकार है
प्रकृति ही आपकी यानी निराकार की शक्ति है
शक्ति के बिना शिव है अधूरे
और शिव के बिना प्रकृति है अधूरी
बिन प्रकृति के आप कैसे साकार जीव बनायेगे
और कैसे ये मायावी सृष्टि चलायेगे
प्रकृति के द्वारा ही आप सृष्टि को साकार करते है
और सृष्टि का सृजन,पालन और संहार करते है
आप है पुरुष और मै हूँ प्रकृति
हम एक दुसरे के बिना अधूरे है
बने है एक दूजे के लिए
और सिर्फ एक दुसरे के साथ ही होते पूरे है
आप है तपस्वी आप की तपस्या महान है
कोई डर आपको मुझसे हो नही सकता
क्योंकि आप ही निर्विकार भगवान है
हंसकर बोले शिव कि
प्रकृति और पुरुष में कुछ मर्यादा होती है
आप जानती है सब की
तपस्वी और योगी के जीवन में इसकी ज्यादा जरूरत  होती है
फिर भी मै आपकी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ
आपको नित्य आकर मर्यादा अनकूल
सेवा करने का प्रस्ताव करता हूँ
इसतरह शिव और पार्वती की वाद विवाद की लीला समाप्त  हुई
और इन तर्क की सहायता से
कैसी होनी चाहिये तपस्वी, योगी के जीवन की शैली
इसकी दिशा जग को ज्ञात हुई
अब तो रोज देवी पार्वती शिव दर्शन को आती थी
पूरी श्र्दा से परमात्मा शिव को श्र्दा सुमन चढ़ाती थी
पर परमात्मा शिव ने सबकुछ देखकर भी अनदेखा किया
और लगा ध्यान खुद को गहन तपस्या में मग्न किया
पर वो आँखे बंदकर भी सब कुछ देख रहे थे
और देवी पार्वती के  बारे में ये सोच रहे थे
की और थोड़े समय में देवी पार्वती की सेवा
अहंकार शून्य हो जाएगी
और उस समय उन दोनों के मिलन की प्रक्रिया
खुद ब खुद सम्भव हो जाएगी        
इसी समय तारकासुर पैदा हुआ
लिया वर ब्रह्माजी से उसने
और उसके अत्याचार का हर तरफ
त्रिलोकी में बोलबाला हुआ
था वर ब्रह्मा जी का कि कोई उसे हरा नही पायेगा
सिवा भगवान शिव के वीर्य से उत्पन्न पुत्र के
कोई और  उसे मार नही पायेगा
जाना जब देवराज इंद्र ने कि देवी पार्वती
भगवान शिव की सेवा में है उपस्थित हुई
नही हुआ इन्तजार सही समय का
और बुलाया मित्र कामदेव को
और अपनी दोस्ती की उनको दुहाई दी
कहा कि उन्होंने ही अब देवताओ को बचाना है
और भगवान शिव के मन में
देवी पार्वती के लिए काम को जगाना है
देवी रति और ऋतू वसंत के साथ
काम देव ने तुरंत  प्रस्थान किया
पहुंचे हिमालय जहाँ भगवान शिव थे मग्न ध्यान में
चलाये बाण जो थे पास उनके
और खलल उनके ध्यान में उत्पन्न किया
योग मुद्रा में ही भगवान शिव ने
काम देव को पहचान लिया
आया क्रोध उनको और खोला नेत्र तीसरा
और जलाकर वंही पर उन्होंने काम देव को भस्म किया
घबराकर देवताओ ने की स्तुति भगवान शिव की
और कर प्रार्थना उनको प्रसन्न किया
कैसे चलेगी बिना काम के सृष्टि
इस बात का उनको हवाला दिया
हुए प्रसन्न भगवान भोलेनाथ
और देवताओ को ये आश्वासन दिया
की आते थे जो नजर अब तक काम देव
अब वो नजर तो नही आयेंगे
रहेंगे वो अदृश्य पर
हरेक प्राणी के हृदय में बस जायेंगे
आएगा युग त्रेता बनके भगवान कृष्ण,
भगवान विष्णु अपनी लीला रचाएंगे
बनकर पुत्र उनका कामदेव
देवी  रति को पति रूप में  मिल जायेगे
और उस जन्म में वो प्रधुम्न के नाम से जाने जायेंगे
सुनकर बात इतनी सब देवताओ का मन शांत हुए
और देकर वरदान ये उनको
प्रभु शिव वहां से अंतर्ध्यान हुए
पर अब वो भगवान शिव के क्रोध की ज्वाला
पूरे जग को जलाती जाती थी
चारो और मचा था हाहाकार
पर वो और भड़कती जाती थी
आखिर अब बचाने को जग को
भगवान ब्रह्मा जी ने उस अग्नि को
बना घोडा उसकी गर्मी को बांध दिया
अब उगलता था मुख से वो सौम्य   आग
सौंपकर  उसे समुन्द्र को
वाडनल उसको नाम दिया
उधर देवी पार्वती बिन शिव के व्याकुल होती जाती थी
नही सूझता था कुछ उनको
बस प्रभु शिव को बुलाती जाती थी
तभी देव ऋषि नारद का वहां आगमन हुआ
समझाया माँ पार्वती को उन्होंने
और नमो: शिवाय: का उनको मन्त्र दिया
पूछा जब माँ ने उनसे कि
क्यों प्रभु शिव ने उन्हें अपनाया नही
बोले नारद की अपने सेवा तो उनकी बहुत की
मगर तपस्या का गर्व आपने मिटाया  नही
बिना  गर्व किये तपस्या आपको करनी होगी
नमो शिवाय: के जाप से
प्रभु शिव के प्यार की गागर भरनी होगी
प्रभु है भक्त वत्सल वो शीघ्र ही प्रसन्न हो जायेगे
और आते ही उचित समय तुरंत आपको अपनायेगे
सुन इतना माँ पार्वती का मन शांत हुआ
बता रास्ता माँ पार्वती को
देव ऋषि नारद का वहां से प्रस्थान हुआ
मान नारद जी की बात देवी पार्वती ने
जब बात तपस्या की माता मेना से की
घबरा गयी वो और एकदम से ऊ इ माँ बोल पड़ी
उसदिन से देवी पार्वती 'उमा' भी कहलाने लगी
राजा और रानी ने उनको बहुत मना किया
न मानी बात किसी की
और हठ कर तपस्या के लिए
माँ पार्वती ने वन की ओर  प्रस्थान किया
कई वर्षो तक घनघोर तपस्या की
भोजन छोड़ा, जल छोड़ा
और सिर्फ  पत्तो पर अपना निर्वाह किया
फिर जब नही बनी बात तो
तपस्या को अपनी और भी उग्र किया 
छोड़ दिए पत्ते भी
और तप को और कठोर बना लिया


ज्यो ज्यो तपस्या उग्र होती जाती थी
मचा हा हा कार त्रिलोकी में
पर माँ की छटा निराली थी
पास आते ही उनके हिंसक जीव भी
स्वत: अहिंसक हो जाते थे
रहते थे शेर और बकरी एक साथ
और एक घाट पर पानी पीते थे
तब देवताओ ने
भगवान ब्रह्मा और विष्णु से ये निवेदन किया
और बात उनकी मान ले देवताओ को साथ
उन सब ने कैलाश की और प्रस्थान किया
वहां योगिराज भगवान शिव
अपने पार्षदों से घिरे समाधिस्थ बैठे थे
मग्न थे वो ध्यान में
पर ध्यान में ही हर बात वो जान जाते थे
जोड़ हाथ कर विनती भगवान विष्णु ने
प्रभु शिव से ये निवेदन किया
है खतरे में ये सृष्टि क्योंकि 
है तारकासुर ने सबको आतंकित किया 
मरेगा असुर तारकासुर सिर्फ तभी
जब  शादी आप देवी उमा से रचायेगे
और करके अनुराग त्रिलोकी पर
 आप अपने पुत्र  को
देवताओ का सेनापति बनायेगे
बोले भगवान शिव कि
शादी अगर मेरी हो जाएगी
तो हो जायेगा काम जिन्दा मनमे सबके 
तथा डालेगा  विघ्न सबको फिर से तपस्या में
और तपस्या अधिक  मुश्किल हो जाएगी
है काम ही क्रोध का जनक
और स्त्री ही मोह की जननी है
आ जाता है जब संसर्ग में कोई स्त्री के
तो फिर तपस्या उसे कहां करनी है
शादी तो है द्वार नर्क का
मुझे अपनी समाधि नही भंग करनी है
रहना है दूर स्त्री से
और शादी नही करनी है
इस पर बोले भगवान विष्णु
कि आप तो भक्त वत्सल है
मुश्किल में है भक्त आपके
अब आप ही उनके रक्षक है
सुनकर बात उनकी भगवान शिव बहुत खुश हुए
कर दी हां उन्होंने और देने को देवी पार्वती को वर
भगवान शिव हंसकर राज़ी हुए
अब तो देवता खुशिया मनाते जाते थे
हंस हंस कर वो भगवान शिव का
गुणगान करते जाते थे
अब बुलाया भगवान शिव ने सप्त ऋषियो को
और उनको ये समझाया
कि जाओ पास देवी पार्वती के और पता लगाओ
कि क्या उनके दिल में है समाया
आये सप्त ऋषि पास पार्वती के
और कहा विरुद्ध भगवान शिव के
करने को शादी उनसे देवी पार्वती को
सप्त ऋषि ने बहुत हतोत्साहित किया
पर सुन निंदा शिव की
देवी पार्वती ने क्रोध प्रगट किया  
बताई महानता शिव की
और जाने का  उन्हें वहां से आदेश दिया
भगवान शिव ही है परब्रह्म, निर्गुण, निर्विकार
ये बात उन्हें बताने लगी
ये पूरा विश्व ही उनका है
नही ऐश्वर्य उन्हें किसी को दिखाना है
ऐसा उन्हें समझाने लगी
निर्गुण है वो क्योंकि
अपने गुण उन्हें किसी को नही बताना है
सम्पूर्ण सृष्टि ही है बालक उनकी
इसलिए अपना प्रभुत्व उन्हें किसीको नही दिखाना है
कभी विकार किसी के लिए उनमे नही आते है
क्योंकि सबको देखते है एक समान
इसीलिए निर्विकार भगवान वो कहलाते है
सुन ये सब खुश हुए सप्त ऋषि
और देवी पार्वती को उन्होंने प्रणाम किया
 जाकर कैलाश पर, बताकर भगवान शिव को
उन्होंने वहां से प्रस्थान किया
अब भगवान शिव ने खुद रचा रूप ब्राह्मण का
और देवी पार्वती के पास वो आये  थे 
और की अपनी ही निंदा और
बदले में झाड देवी पार्वती से खाए थे
सुन ताने उन ब्राह्मण रुपी भगवान शिव से
देवी पार्वती निराशा में आ गयी
छोड़ने को दुनिया वो तुरंत अग्नि में समा गयी
मगर शिव कृपा से अग्नि भी शीतल बन गयी
फिर तो देवी पार्वती छोड़ धरती को
उपर की और चल पड़ी
पकड़ हाथ प्रभु शिव ने
पार्वती को वापिस बुला लिया
दिखाया असली रूप अपना
और देवी पार्वती को अपनी बना  लिया
की प्रार्थना देवी पार्वती ने
कि आप जाइये
और मेरे पिता से मांगकर मेरा हाथ
उनका गौरव बढाइये
बोले शिव कि परमात्मा हूँ मै
और आप है शक्ति
पुरुष हूँ मै
और आप है प्रकृति
आप ने माया से सृष्टि को व्यापक किया हुआ है
और मैंने आपको अपने में धारण किया हुआ है
हम दोनों एक है पर स्वतंत्र कार्य करते है
पर जीवो को हम मायावश अलग लगते है
मै निराकार हूँ
पर भक्तो कि प्रार्थना पर साकार होता हूँ
करता हूँ लीला
और उनके दुखो को हरता हूँ
मै और आप कभी अलग  हो नही सकते है
पर दुनिया वाले हमारी असलियत तक
कभी पहुंच नही सकते
और अब आपने लेकर रानी मेना के गर्भ से जन्म
रचा कर मुझसे शादी
देकर पुत्रो  को जन्म देवताओ के कष्ट हरने है
होंगे एक पुत्र ज्ञान रुपी
और दुसरे वैराग्य के प्रतीक बनने है
जानते है हम कि ये लीला है सब
मगर करके लीला लोगो को राह दिखानी है
हमेशा एक थे हम पर फिर भी करके शादी
लोक रीती हमे निभानी है
बोले शिव कि इस तरह तो मांगकर
मै सामने उनके याचक बन जाऊंगा
होकर मै परमात्मा कैसे
किसी और को दाता बनाऊंगा  
सुन देवी पार्वती बोली कि आप तो दयालु  हो
आप मेरी विनती कैसे ठुकराओगे
करने को प्रार्थना मेरी पूरी
मेरे पिता के पास अवश्य जाओगे
जब में बनी सती और आप से शादी रचाई थी
तब न हुई थी ग्रह पूजा, न वेदों कि रीती अपनाई थी
तभी उस समय समस्या आई थी
और अंत में  देवी सती अग्नि में समाई थी
अब कि बार पूरी वेदों की विधि अपनानी है
और दुनिया को विवाह के लिए
वेदों की सर्वोतम रीती समझानी  है
दिखाने को दुनिया को राह भगवान शिव  ने
राजा हिमवान के पास जाने का वचन दिया
और शीघ्र ही अपने धाम कैलाश को
वंहा से प्रभु शिव ने तुरंत प्रस्थान किया
जाकर जब अपने पार्षदों  नंदी जी महाराज
और भैरों बाबा जी को ये बतलाया था
तो लगे नाचने सब
और  हर तरफ ख़ुशी का समां बनाया था 
उधर जब वापिस महल आई देवी पार्वती
महाराज हिमवान ने उन्हें सर आँखों पर बैठाया था
जानकर की सफल हुई तपस्या उनकी,
उनको गले से लगाया था
हुआ कार्य ये महान
इसलिए नगर में उत्सव मनाया था
आइये शंकरजी भी उत्सव में
उन्होंने नट का वेश बनाया  था
और बजा डमरू उन्होंने
सारे नगर को साथ नचाया था
खुश हुए हिमवान और मैना पर और  अपने
ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र के रूप का  दर्शन करवाया था
पर फिर देवी  पार्वती की  माता मैना और पिता हिमवान को
अपनी माया से मोहित किया
और दिखा कर असली रूप अपना
सब कुछ फिर से भुला दिया
हुई खुश माता मैना नट रुपी भगवान शंकर से
और जब पूछा क्या मांगते इनाम
तो भगवान शिव ने लीला रचाई थी
मांग देवी पार्वती को इनाम में
करने की उनसे शादी की इच्छा दिखाई थी
न जानकर असली रूप भगवान शिव का
राजा हिमवान ने नाराजगी दिखलाई थी
 इस तरह देवी पार्वती को दिया वचन पूरा  करने को
भगवान शिव ने अपनी बात निभाई थी
अब वापिस आ कैलाश पर भगवान शिव ने
 सप्त ऋषि को वहां बुला लिया
जाना होगा राजा हिमवान के पास
मांगने को भगवान शिव के लिए
माँ पार्वती का हाथ ऐसा उन्हें समझा दिया
पहुंचे सप्त ऋषि राजा हिमवान के पास
और बताई उन्हें शिव इच्छा की बात
पर जताया हिमवान ने ऐतराज कि
नही है भगवान शिव के पास
राजा जैसे कोई राजसी ठाट
अब कैसे बनेगी बात
अब आप ही बताये कि
कैसे मै मान जाऊ होकर एक बाप
तब समझाया सप्त ऋषियो ने की
परमात्मा शिव सब सृष्टि के मालिक है
ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र रूप में वो
जनक, पलक और सृष्टि के संहारक है
जगत जननी माँ आदि शक्ति ही
बन पार्वती आपके घर में आई है
दे फल आपके पूर्व जन्मो की तपस्या का
उन्होंने आपकी शान बड़ाई है
सब वैभव, ऐश्वर्यों और भोगो के शिव दाता है
और  कोई आकर्षण नही इनका उनको
इसलिए इन सबसे नही रखा उन्होंने कोई नाता है  
शिवा तो है शक्ति शिव की
इसलिए उनको यह विवाह तो रचाना होगा
मारने  के लिए तारकासुर को देकर पुत्र अपना देवताओ को
उन्हें अपना वचन तो निभाना होगा
जब पूछा राजा ने ऋषियों से  की वो है असमंजस में
अब आप ही कोई राह दिखाइए
एक तरफ है मोह पिता का
और दूसरी और है वास्ता धर्म का
क्या है सही अब आप ही मुझे बताइए
बोले सप्त ऋषि की आप ही बताइए
कि हम कैसा वचन सुनाये
होते है वचन तीन तरह :
पहला तो पहले तो सुनने में खूब भाए
फिर बाद में जब आये नतीजा उसका
तो इंसान खूब पछताए
सुनाते है वचन ऐसे
हो जो बुद्धिमान दुश्मन तुम्हारे
कैसे कहे ऐसी बात क्योंकि 
हम तो है शुभ चिंतक तुम्हारे
है दूसरा वचन वो
जो पहले तो कडवा लगता है
पर पीछे से जब सोचता है इंसान
तो वो वचन ही भला लगता है
तीसरी तरह का वचन पहले
और बाद दोनों समय अच्छा लगता है
है जो शुभ चिंतक तुम्हारा
वो ही  ऐसी बात करता है
है नेक सलाह ये ही की तुम
शिव पार्वती का शुभ विवाह सम्पन्न  करो
सौभाग्य पाओ बनने का ससुर प्रभु शिव का
और ख़ुशी-ख़ुशी शिव पार्वती को विदा करो
समझे अब राजा हिमवान
और उन्होंने तो हामी भर दी
मगर नही समझी माता मैना मोहवश
और उन्होंने फिर भी न करदी
तब समझाया उन्हें ऋषि पत्नी अरुन्धिती  ने
तो उन्होंने भी सोचकर
शिव पार्वती विवाह की हा करदी
एक सप्ताह बाद का शुभ महूर्त निकल गया
हुई तैयारी शुरू और पूरा ब्रह्मांड सज गया
ब्रह्मा जी, विष्णुजी, सब देवताओ,गन्धर्व, ऋषि, किन्नर,
और सभी शक्तिओ को निमत्रण भेज दिया
आये सब देव, गन्धर्व, ऋषि, मानव, भूत, प्रेत आदि भी
और बारात का समा बन गया
देवी चंडी भगवान शिव की बहन बनी
पहने सर्पो के गहने वो सबसे आगे चली
पीछे उनके महाकाल, भैरो और अन्य भूत प्रेत आते थे
बजाते थे वो डमरू,सिंघी और अन्य वाद
 तथा ख़ुशी से नाचते और गाते जाते थे
फिर थी  सवारी भगवान विष्णु की जो
जिसमे वो सब ऐश्वर्यों से घिरे पार्षदों
और देवी लक्ष्मी सहित शोभा बढ़ाते थे
उनके पीछे पुत्रो, ऋषियो तथा देवी सरस्वती सहित
करते वेदों का पाठ
भगवान ब्रह्मा जी बरात में मंगल गाते थे
और प्रभु शिव की
बरात की शोभा बढाते थे
इस तरह सृष्टि के हर प्रजाति के जीवो से सजी
परमात्मा शिव की अद्धभुत बारात चली
पूरी सृष्टि के जीवो के मन में थी
असीम आनन्द और ख़ुशी भरी
पहुंची जब भगवान शिव की  बारात
महराज हिमवान की नगरी के बाहर
भेजा संदेश देव ऋषि नारद के हाथ
तुरंत आये हिमवान जी बन्धुओ के साथ
करने को स्वागत नगर के द्वार
देखा सब देवताओ, यक्षो, गन्धर्वो,
ऋषियो, भूतो, प्रेतों और शक्तिओ आदि को एक साथ  
थे महराज हैरान
और किया उन्होंने सब बरातियो सहित
भगवान शिव को प्रणाम
बारात को नगर में लिवा ले जाकर
वो फूले नही समाते थे
अद्धभुत छटा थी भगवान शिव थे मध्य में
बाई तरफ भगवान विष्णु
और दाहिनी तरफ भगवान ब्रह्मा शोभा पाते थे
आस पास अन्य सब बराती
ख़ुशी से नाचते गाते जाते थे
और सब नगर वासी उनके स्वागत में
अपनी पलके बिछाते थे
हुई शिव लीला
और देवी मैना को देख बरातियो को अहंकार हुआ
तोड़ने को उनका अहंकार भगवान शिव ने
बरातियो को अलग अलग बाँट दिया
उधर देवी मैना ने नारद जी को बुला लिया
और दिखाने का प्रभु शिव की सवारी का
उनसे माया वश आग्रह किया
जबआई भगवान विष्णु की सवारी
और देखी उनकी छवि निराली 
तो पूछा देवी मैना ने क्या यही भगवान शिव है
तो बोले नारद जी कि
अरे ! ये तो श्री हरी विष्णु है
फिर आये ब्रह्मा जी
जो वेद उच्चारते जाते थे
और देखकर उनको
तीनो लोक फूले नही समाते थे
बोली मैना की जरूर यही भोले भंडारी है
बोले भगवान ब्रह्मा कि
ये तो ब्रह्मा जी की सवारी है
फिर आये भगवान शिव की सवारी
आगे आगे भूत प्रेत नाचते जाते थे
 कोई था बिन सिर का, किसकी का था मुह टेड़ा
कोई उलटे सिर का, कोई था जटाओ से भरा
कोई आग उगलता और कोई हुंकारे भरते  जाते थे
पीछे पीछे उनके भगवान शिव पांच सिर धारण किये
तीन तीन आँखे लिए, जटा जूट धरे,
शरीर पर भस्म मले
माँ मैना को डराते आते थे
और देख माँ मैना को भयभीत
अपनी लीला पर मन ही मन मुस्काते थे
देख उनका ये विकराल रूप
देवी मैना एक दम घबरा गयी
और देख उनका ये महायोगी रूप
वो मूर्छित होकर धरती पर जा  पड़ी
अब वो देवी पार्वती की शादी
प्रभु शिव से न करने को अड़ी हुई थी
उधर प्रभु शिव की बरात
महराजा हिमवान के महल के दरवाजे पर खड़ी हुई थी
सप्त ऋषियो ने समझाया, राजा हिमवान ने समझाया
खुद देवी पार्वती ने समझाया
पर वो किसी की बात न मानी
तब भगवान विष्णु ने
खुद जाकर उन्हें समझाने की ठानी
गये भगवान विष्णु
और जाकर देवी मैना को समझाया
नही पहचानी वो शिव लीला को
इसीलिए उनका है मन भरमाया
शिव तो निराकार और साकार दोनों रूप में मिलते है
जैसा चाहे वो वैसे ही जीव को दीखते है
आप है भाग्य शाली कि
आपकी बेटी पार्वती की तपस्या रंग लायी है
और ये है आपके अच्छे कर्मो का फल
कि ब्याहने देवी पार्वती को
भगवान शिव की बरात दरवाजे पर आपके आई है
तब मानी रानी मैना कि
वो करने को भगवान शिव का देवी पार्वती से
ब्याह राजी तभी हो पाएंगी
जब भगवान शिव की
सौम्य  और वैभव शाली  मूर्त सामने उनके आएगी
सुन ये भगवान विष्णु भगवान शिव के पास गये
और जाकर उन्हें रानी मैना को
सौम्य  मूर्ति दिखाने का अनुरोध करने  लगे
सुन ये सब भगवान शिव के चेहरे पर हंसी आई थी
दिखा वैभव शाली और सोम्य रूप अपना
और दे दर्शन अपने तेजस्वी रूप के
समेत रानी मैना के हर उपस्थित जन की
किस्मत उन्होंने  चमकाई थी
देख उनका ये रूप अब रानी मैना खुशिया मनाने लगी
गाती थी मंगल आरती वो और गीत स्वागत के गाने लगी
अब तो हुई शुरू शादी की रस्म
और  देवी पार्वती आई अम्बिका पूजन को
और उस अवसर पर देखा शिव ने पार्वती को
और माँ पार्वती ने प्रभु शिव को
और इस तरह हंस पड़े दोनों
अपनी ही  लीला पर
जब आया वक़्त कन्यादान का
और मन्त्र उच्चारण शुरू हुआ
निभाने को वैदिक परम्परा
वर वधु के कुल और गोत्र के बारे में विवरण दिया
और पूछा ब्राह्मणों ने जब
विवरण प्रभु शिव के कुल के नाम का
भ्रमित हुए राजा हिमवान
जब न पता चला प्रभु शिव के  आदि अंत का
न ही पता चला प्रभु शिव के जन्म
तथा न ही पता चला उनके जनक के नाम का
तब देव ऋषि नारद ने राजा हिमवान को ये समझाया
और उनका भ्रम दूर करवाया
बताया की शिव तो परमात्मा है
इनका आदि नही जान सकता कोई
सिर्फ इनके खुद के सिवा
नही जानता इनको सम्पूर्णतया कोई
यह है निर्गुण, निर्विकार, अजन्मे, परब्रह्म परमात्मा
अपनी इच्छा से करने को भक्तो पर कृपा
ये साकार रूप अपना  लेते है
यह तो है पार्वती की तपस्या
जो की ये आज इस रूप में यहाँ बैठे हुए  है
नाद से ही ये सृष्टि में ये साकार हुए
और सृष्टि का आरम्भ भी नाद ही है
और ये साकार रूप में जो बैठे है भगवान रूद्र(भगवान शिव)
तो मान लो की उनका कुल भी  नाद ही है
अब संशय राजा हिमवान का दूर हुआ
और उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी
देवी पार्वती का कन्या दान किया
स्वीकार कर देवी पार्वती को
प्रभु शिव ने  राजा हिमवान का सम्मान किया
छूकर  पृथ्वी को उन्होंने काम देव का आह्वान किया
काम का उपयोग कर सकता है इंसान
सिर्फ अपनी शादी के बाद
इस बात का जग को उन्होंने पैगाम दिया
अब  सब तरफ लोग ढोल नगाड़े बजाने लगे
जागी उम्मीद पाने की  छुटकारा तारका सुर से
इस ख़ुशी में त्रिलोकी में जीव उत्सव मनाने लगे
बनाकर अग्नि को साक्षी दोनों ने शादी का वचन लिया
वो तो है दोनों वैसे ही अभिन्न
पर फिर भी ये सब लोकाचार किया
भरकर मांग में देवी पार्वती के संदूर उन्होंने
अपने रिश्ते को एक नाम दिया
अब चारो और चारो तरह के वाद बजने लगे
कही बजे तात(तार वाले),
कंही अनिद्ध (जिस पर चमड़ा मढ़ा हो जैसे ढोल)
 कंही सुमिक्ष(छेद वाले जैसे बांसुरी )
और कंही घन(आपस में टकराने वाले जैसे ताल) बजने लगे
इस तरह करके शादी  गये जनवासे में
भगवान  शिव और माता पार्वती चले गये
तब सभी देव पत्निया वहां करने दर्शन आने लगी
करके दर्शन उन दोनों से  मुंह मांगे वर पाने लगी
तभी आई देवी रति
और करके प्रणाम अपनी विनती सुनाने लगी
कहा कि माना कि दोषी थे काम देव
पर वो कार्य उन्होंने स्वार्थ वश नही किया
जो भी हुआ वो उन्होंने  देवताओ को
तारकासुर से  बचाने के लिए किया
इसलिए हें महादेव मुझ पर आप तरस खाइए
और करके कृपा  मेरे पति को फिर से जीवित बनाइए
सुन उनकी प्रार्थना भोले शंकर का मन  द्रवित हुआ
ली कामदेव की  राख  और उनको फिर से जीवित किया
कहा साथ में कि
अब आप सिर्फ प्राणीयो के हृदय में ही रह पाओगे
और सावधान रहिये कि मेरे घर में कभी नही आओगे
देवी रति और और कामदेव ने
दोनों प्रभु शिव और माँ पार्वती  को प्रणाम किया
करके दोनों का गुणगान ख़ुशी ख़ुशी वहां से प्रस्थान किया
 कुछ दिन रही बारात वहां पर
खूब ख़ुशी का वहां पर महौल रहा
हुए उदास राजा हिमवान
जब भगवान शिव ने बारात की विदाई को कहा
अब विदाई से पहले आई एक ब्राह्मणी
देवी पार्वती को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया
पति की सेवा ही है धर्म पत्नी का
चाहे रहे जवान या फिर वो हो जाये बूढा
सुख हो चाहे हो वो दुःख
कभी पत्नी पति से नही हो जुदा
और विचारे सदा पति को वो
तथा व्यभिचार से रहे दूर सदा
व्यभिचारनी स्त्री न सिर्फ खुद का
बल्कि अपने पिता और पति के
 कुल का भी नाश करती है
खुद तो जाती है नर्क में
साथ ही बल्कि समाज का भी विनाश करती है
जो बोलती है अन्यथा सामने पति के
वो अगले जन्म में कुतिया बनती है
करती है जो निंदा पति की
वो अगली बार सुअरी बनती है
और बनके सुअरी वो खुद ही खुद का गन्द चरती है
पतिवर्ता में भी जो है उत्तम
वो स्वप्न में भी सिर्फ पति के संग विचरती है
उससे है तो निम्न वो
अन्य पुरुष को पिता, भाई और पुत्र समझती है
उससे नीचे की श्रेणी की पतिव्रता
सिर्फ लोक लाज से डरती है
आप तो है स्वयंम जगत जननी
आप तो सब जानती है
ये तो मैंने लोकाचार वश कहा है
देकर मुझे ये मौका न सिर्फ मुझ पर
बल्कि दिलवाकर  ज्ञान पूरे ब्रह्मांड पर
आपने अनुग्रह किया है  
 हुई विदाई हिमालय से और
कैलाश पर भगवान शिव पार्वती का आगमन हुआ
विवाह हुआ सम्पन्न और देकर शुभ कामनाये
बरातियो ने वंहा से  प्रस्थान किया
कुछ समय बाद  भगवान शिव के वीर्य से
एक अति प्रतिभाशाली पुत्र उत्पन्न हुआ
किया ग्रहण उनको गंगा ने
और छह कर्तिकायो ने उनका पालन किया
इसलिए उन्होंने ये छह मुख पाए
और वो  कुमार कार्तिक्य  कहलाये
लेकर उनको देवता भगवान शिव के पास आये
भगवान शिव और देवी पार्वती
देख उनको हर्ष से फूले नही समाये
और प्यार से उन्हें
अपनी गोदी में उन्हें बिठाया
और देकर दुलार
माँ पार्वती और पिता भगवान शिव ने
उनके सिर पर हाथ फिराया
की प्रार्थना देवताओ ने भगवान शिव से
कि कुमार कार्तिकेय को उनका सेनापति बनाइए
और उनके हाथो देवशत्रु तारकासुर का संहार कराइये
प्रसन्न हो भगवान शिव ने
कार्तिकेय को देवताओ को सौंप दिया
साथ ही साथ उनको विजय श्री का आशीर्वाद दिया
माता लक्ष्मी ने दी अनमोल रत्न माला
देवी पार्वती ने दी शक्तिया
और देवी सवित्री ने उनको
सिद्धियो से भरपूर किया
हर देवता ने दी  भेंट अपनी शक्ति अनुसार 
और सबने कुमार कर्तिकये को सेनापति घोषित किया
कुमार कार्तिकेय ने
तारकासुर का महीसागर के पास युद्ध का आह्वान किया
आया तारका सुर अपनी सेना के साथ
और देवताओ से भयंकर युद्ध किया
पहले वीरभद्र और तारकासुर में भयानक युद्ध  हुआ
और जब चलाने लगे वीर भद्र दिव्य त्रिशूल
तो कुमार कार्तिकेय ने मना किया
करना था सफल वरदान ब्रह्मा जी का
इसलिए वीरभद्र को सामने से हटा दिया
जब आया क्रोध भगवान विष्णु को
तो उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र चला दिया
घायल होकर गिरा तारकासुर
पर ब्रह्माजी के वरदान के प्रभाव में
फिर से उठकर  खड़ा हुआ
अब भगवान विष्णु और तारकासुर का
आपस में भीषण संग्राम शुरू हुआ
और एक लम्बे समय तक चला 
सारा त्रिलोकी एक बार तो भयानक शोर से काँप उठा
तब बोले भगवान ब्रह्मा  कुमार कर्तिकये से
कि जानते है आप की
क्यों लिया आपने  प्रभु शिव के अंश से अवतार
अब आप जाइये
और तारकासुर को मारकर उसका  अस्तित्व मिटाइए
हंस पड़े कुमार और चल पड़े युद्ध को
और तारकासुर से उनका भयंकर युद्ध हुआ
फिर हुआ वही तथा अंत में  तारकासुर का अंत हुआ
ली सब लोको ने चैन की सांस
और धर्म का स्वराज्य फिर से स्थापित हुआ
तब आये प्रभु शिव और माता पार्वती
और कुमार कर्तिकये को आशीर्वाद दिया
किया लाड उनसे
और उनको अपनी गोद में बिठा लिया
बनाया उत्सव त्रिलोकी ने
और हर तरफ धार्मिक कार्य फिर शुरू हुए
ले कुमार कार्तिकेय को साथ
प्रभु शिव और माँ पार्वती कैलाश को चले गए
इस तरह बोली एक दिन सखिया देवी पार्वती की
की नही है कोई अपना गण कैलाश पर
हमे भी करना चाहिये नियुक्त
अपना कोई गन अपने द्वार पर
और हुई शिव लीला एक दिन
जब चले आये भगवान शिव
देवी पार्वती के महल के भीतर
बताये बिन अचानक कैलाश पर
देवी पार्वती नहा रही थी
और देख भगवान शिव को शर्मा गयी थी
तब जाने के बाद भगवान शिव के
देवी पार्वती ने ये निश्चय किया
और अपने शरीर के मैल से
एक पुत्र को उत्त्पन्न किया
देकर नाम श्री गणेश
तथा देकर छड़ी एक हाथ में
उनको द्वारपाल नियुक्त किया
जब आने लगे अगली बार भगवान शिव तो
उनको उन्होंने  अंदर नही आने दिया
क्योंकि नहा रही थी माँ पार्वती
इसलिए उन्होंने माँ के आदेश का पालन किया
पहले तो उस  द्वारपाल(भगवान गणेश) को
शिव गणों ने खूब समझाया
फिर जब श्री गणेश  नही माने
 तो आपस में भयंकर   युद्ध हुआ
जब उनसे नही सम्भले श्री गणेश
तो प्रभु शिव को आना पड़ा
चलाया त्रिशूल और बालक गणेश का
सर धड से अलग जा पड़ा
जब चला पता देवी पार्वती को
तो उनको अत्यंत क्रोध गया
जगाया सब शक्तियों को
तथा क्रोध की ज्वाला को हर तरफ उत्पन्न
और हुआ भीषण विनाश हर तरफ
तथा प्रलय की सी सिथ्ति हुई
घबराए सब देवता
और जाकर माँ से मांग दया उनकी स्तुति की
सुन उनकी प्रार्थना भक्त वत्सल देवी ने कृपा की
और कहा देवताओ से
कि कंहे भगवान शिव को
की मेरे पुत्र को पुन:  जीवत करे अभी
साथ ही दे सम्मान उनको
और सर्वप्रथम देव के पद पर नियुक्त करे
और साथ ही अपने
पुत्र कि तरह अपना ले
हर मंगल कार्य उनकी पूजा से आरम्भ हो
हो वो सर्व अध्यक्ष
और हर तरफ उनका स्वर्स्व हो
आये देवता भगवान शिव के पास
और सारी बात उनको कह सुनाई
मान गये भगवान शिव बात देवताओ की
और उनको ये बात समझाई
जाय उत्तर दिशा में
और जिस जीव को वो प्रथम पाए
लाये सिर उसका
और बालक गणेश के धड पर जा लगाये
और इस तरह वो
उस बालक  को पुन:  जीवित कराए
उनके आदेश का पालन हुआ
और उत्तर दिशा में प्रथम जीव एक हाथी मिला
काटकर सर उसका
बालक गणेश के धड पर लगा दिया
हुए जीवत श्री गणेश
और  माँ शक्ति की क्रोध ज्वाला को शांत किया
हुई स्थापना श्री गणेश की सर्व अध्यक्ष  पद पर
और हर किसी ने उनका खूब गुण गान किया
अब सब देवता  लेकर गणेशजी को भगवान शिव के पास गये
बैठाकर उनकी गोद में उनको  उनकी स्तुति में लग गये
किया प्यार गणेशजी को भगवान शिव ने
और  गणाध्य्श नियुक्त हुए
मिला वरदान उनको कि
कोई भी पूजा तब ही सफल होगी
जब सबसे  पहले
गणेशजी की पूजा आराधना  होगी
हर लेगे वो हर विघ्न उनका
जिन पर उनकी कृपा होगी
और इस तरह देकर वरदान भगवान शिव ने
भगवान गणेश जी पर कृपा की
साथ ही गणेश जी को दूसरा पुत्र स्वीकार किया
चल दिए सब देवता अपने अपने स्थान को
और इस तरह देवी पार्वती का गुस्सा शांत किया
इसी तरह समय बीता और दोनों पुत्र जवान हुए
हुए शादी योग्य
और संसार की नीति निभाते हुए
भगवान शिव-पार्वती
उनकी शादी के लिए चिंतित हुए
बुलाया दोनों को
और उन्हें  पृथ्वी परिक्रमा का  निर्देश दिया
कहा जाओ और करके आओ परिक्रमा पृथ्वी की
तब ही हो पायेगा तुम्हारा विवाह
जो पहले परिकर्मा करके आएगा
वो ही पहले विवाह रचाएगा
कुमार कार्तिकेय ने तुरंत
पृथ्वी परिक्रमा के लिए प्रस्थान किया
श्री गणेश ने लिया सहारा बुद्धि का
और माता पिता का आसन बिछा दिया
बिठा दोनों को उनको पुष्प अर्पण कर
उनकी आराधना कर उनको उन्होंने प्रसन्न किया
की  उनकी सात सात परिक्रमा
और उनसे ये निवेदन किया
कि अब मेरी  शादी करा दो
मैंने अपनी प्रतिज्ञा निभा दी है
वेद शास्त्रों का है ये कहना कि
माता पिता कि सेवा
बच्चो का सच्चा धर्म ये ही है
एक परिकर्मा माँ बाप की
धरती कि एक परिकर्मा के समान है
है बात ये बिलकुल सच्ची
क्योंकि कहते ये ही वेद पुराण  है
अब माननी पड़ी बात श्री गणेश की
और बुद्धि और सिद्धि से उनकी शादी की
हुए लाभ और क्षेम दो पुत्र उनके
इस तरह अक्लमंदी से
श्री गणेश जी ने बाजी जीत ली
जब आये कुमार कार्तिकेय तो उनको बड़ा क्षोभ हुआ
हुए नाराज और छोड़ा कैलाश
और क्रोंच पर्वत उनका ठिकाना हुआ
बहुत मनाया भगवान शिव और पार्वती ने
मगर उनका क्रोध नही ठंडा हुआ
आखिर बनके ज्योतिलिंग-शक्ति पीठ 
हुए स्थापित  शिव -शक्ति मलिकार्जुन में
हर अमावस को भगवान शिव का
और पूर्णिमा को माँ पार्वती का वहां पर ठिकाना  हुआ
समय गुजरा और तारकासुर के तीनो पुत्र बड़े हुए
की कठोर तपस्या ब्रह्मा जी की और
उनसे तीन स्वर्ण, चांदी और लोहे के
बने  लोक उन्हें प्राप्त हुए
साथ ही लिया ये वरदान की आएगी मृत्यु तभी
जब तीनो लोको  एक सीध में आ जायेंगे
और भगवान शिव खुद उन तीनो लोको को
 नष्ट करने को एक तीर से निशाना लगायेंगे
उससे पहले नही आएगी मृत्यु
ये जान तीनो भाई निश्चिन्त होकर रहते थे
पर करते थे भगवान शिव की पूजा
और नागरिको को नही सताते थे
पर देव द्रोही थे वो
और देवताओ को उनका भाग नही पहुंचाते  थे
और जब भी मिलता था मौका
वो देवताओ को अपमानित करते रहते थे
तब देवताओ ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की
मगर नही मार सकते थे वो क्योंकि 
पाया था वर  उन तीनो ने
करके उनकी(ब्रह्मा जी ) भक्ति  
तब देवताओ ने  भगवान विष्णु की शरण ली
और तब देवताओ को लेकर
सबने भगवान शिव की शरण ली
भगवान विष्णु जी और भगवान ब्रह्मा जी ने
बताई समस्या उनको
और समाधान की  उनसे प्रार्थना की
बोले भगवान शिव की
तीनो भाई नागरिको को कुछ नही कहते है
करते है मेरी पूजा और अपने लोको में शांति से रहते है
अगर चाहते है देवता उनका करना नाश
तो उन्हें अधर्म के मार्ग पर लाना होगा
करनी होगी भंग पूजा उनकी
और उनके लोको में व्यभिचार फैलाना होगा
तब रची लीला भगवान विष्णु ने
और उन असुरो का दिमाग खराब किया
किया शिव पूजा से विमुख उनको
और उनके लोको में व्यभिचार का प्रसार किया
फिर पहुंचे सब देवता प्रभु शिव के पास
और उनसे ये निवेदन किया
हें प्रभु अब कीजिये उन असुरो का नाश
अब तो उन्होंने दया धर्म भी छोड़ दिया
माने प्रभु शिव
और भगवान विश्वकर्मा उनके लिए रथ बनाने में लग  गये
था अदभुत ये रथ जिसमे स्वयम ब्रह्मा जी सारथि बने
तब बोले प्रभु शिव कि करने को उन असुरो का अंत
पहले सब देवताओ सहित
सब जीवो को पाशुपत अपनाना होगा
मानना होगा सबको स्वयम को पशु
और प्रभु शिव को पशुपति बनाना होगा
हुए उदास सब देव की वो भी अब पशु कहलायेगे
दी तसल्ली प्रभु शिव ने कि
छूट जायेगे वो पशुपात से अगर पशुपत व्रत अपनायेगे
अब तो देवता प्रसन्न हुए
और तुरंत पशुपत अपना लिया
की जय जय कार प्रभु शिव की
और उन्हें पशुपति बना लिया
अब तो उन असुरो के तीनो लोक
एक साथ एक सीध में आ गये
चढाया तीर कमान पर
लेकिन प्रभु शिव श्री गणेश जी कि पूजा बिसरा गये
हो जाता अगर कार्य पूर्ण तो प्रभु शिव का
तो स्वयम उनका दिया वरदान झूठा हो जाता
बिना विघ्नहर्ता की पूजा के
वो कार्य कैसे सम्पूर्ण हो जाता
करके कोशिश भी
प्रभु शिव तीर अंगूठे से नही खींच पाए
हुई आकाशवाणी की पहले करे पूजा गणेश जी की
और अपना दिया वचन निभाए
तब की पूजा उन्होंने श्री गणेश की
और अपने  तीर को छोड़ दिया
गिरे तीनो असुर जलकर
और उनके तीनो लोको को भी भस्म किया
अब तो हर तरफ प्रभु शिव की  जयजयकार हुई
और सृष्टि  उन असुरो के संताप से आज़ाद  हुई
इसी  तरह शंखचुड  नाम का
एक असुर पैदा हुआ था 
पूर्व किसी जन्म में ये
भगवान श्री कृष्ण का सखा सुदामा हुआ था 
राधाजी जो की
जगतजननी का पांचवा सर्वोतम स्वरूप है
उन्होंने सुदामा को श्राप दिया था
और उस श्राप के प्रभाव से ही
सुदामा असुर बन शंखचुड बना था
शंख चुड बहुत प्रतापी था
और कर भीषण  तपस्या ब्रह्मा जी  की
उसने उनको खुश किया  था
 और उनसे विष्णु कवच
और देवताओ से अजेय रहने का वर पाया था
दूसरी तरफ  देवी तुलसी तपस्या उनसे शादी के लिए
कर रही है तपस्या उन्हें यह ब्रह्मा जी ने बताया था
और मान आज्ञा ब्रह्मा जी गये जब शंख चुड
पास  देवी तुलसी के तब देवी तुलसी ने यह जतलाया था
 कि नारी तो है माया जो बडो बडो की मती घुमाती है
और नारी ही है जो   आदमी को मोह माया में फसाती है
मगर हंसे शंख चुड और बोले कुछ  है  झूठ तो कुछ सच है
नारी है अगर सती तो वो पति की सबसे बड़ी रक्षक है
पर जो पुरुष स्त्री के सामने झुक जाता है
वो कंही भी इज्जत नही पाता है
पितृ उसका तर्पण ग्रहण नही करते,
देवता उसका चढावा ग्रहण नही करते
वो हीन दृष्टि से देखा जाता है
और समाज में कंही सम्मान नही पाता है
मै जानता हूँ की आप सतीत्व का प्रतीक है
और मेरी पत्नी बनेगी ये मुझे पूरा यकीन है
सुनकर ये देवी तुलसी राजी हुई
और इस तरह उन दोनों की शादी हुई
पाकर वरदान शंख चुड देवताओ से विजयी हुआ
किया तीनो लोक पर कब्ज़ा
और देवताओ का भाग भी खाने लगा
तब देवता संतप्त हुए
तथा भगवान ब्रह्मा और विष्णु को लेकर
भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पर पहुंच  गये
की प्रार्थना की कीजिये शंख चुड का वध
और देवताओ को उनका सम्मान दिलाईये
कीजिये इसका अंत
और देवताओ को वापिस उनका राज दिलवाइए
बोले भगवान शिव
कि शंख चुड तो बड़े अच्छे से राज करता है
नही दुखी उसकी प्रजा
और हर कोई उसका गुण गान करता  है
की प्रार्थना सब देवताओ ने भगवान शिव से
कि होना शंख चुड का उनके ही हाथो निदान  है
करे  कृपा आप है भक्तवत्सल
ये ही विधि का विधान है 
तब भगवान रूद्र ने
ले भद्रकाली को साथ में शंख चुड पर चड़ाई की
साथ में थे श्री गणेश और कुमार कार्तिकेय
और साथ  गणों की सेना चली
हुआ पहले वीरभद्र और शंख चुड का भयंकर युद्ध
और फिर बीच में माँ भद्र काली आई थी
पिया खून असुरो का
जहाँ जहाँ उन्होंने अपने जीभ घुमाई थी    
फिर हुई आकाश वाणी
कि भगवान शिव को ही आना होगा
और आकर अपना त्रिशूल
उस दैत्य पर चलाना होगा
तब बताया भगवान शिव ने भगवान विष्णु को
कि मारना है अगर शंख चुड को तो
भगवान विष्णु जो  को स्वयम  जाना होगा
और करना होगा सतीत्व नष्ट तुलसी का
और विष्णु कवच वापिस पाना होगा
ये दोनों है रक्षक शंख चुड के
इन दोनों से दूर उसे करवाना होगा
तब भगवान विष्णु बन बूढ़े ब्राह्मण
शंख चुड के पास गये
और विष्णु कवच वापिस शंख चुड से
भिक्षा में मांग लाये
फिर बने  नकली शंख चुड तुलसी के पास गये
और हरा सतीत्व उसका
और शंख चुड की मृत्यु का कारण बने 
होते ही सतीत्व हरण तुलसी का
भगवान शिव ने त्रिशूल चलाकर शंख चुड का वध किया
पता चला जब तुलसी को
तो उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया
तभी प्रगट हुए भगवान शिव
और तुलसी को ये समझाया
की जो भी हुआ
ये शंख चुड के पूर्व जन्म का फल समझो
है ये ही  समय की माया
अब छोड़ो इस शरीर को
और अपना दिव्य शरीर धारण करो
 और वैकुण्ठ में जाकर 
भगवान विष्णु के संग वास करो        
तभी शंख चुड के शरीर की भस्म से शंख प्रगट हुआ
और शंख चुड फिर से श्री कृष्ण का  गोप नियुक्त हुआ
 देवी तुलसी चली गयी वैकुण्ठ में
भगवान विष्णु के साथ और शरीर से अपने
गण्डकी नदी को प्रगट किया
करने को श्राप पूरा भगवान विष्णु का
एक अंश शालिग्राम बना दिया
खाते है हजारो कीड़े उसे और चक्र उसमे दिखाते है
जो गिर जाते  है गण्डकी नदी में
वो शालिग्राम पवित्र हो जाते  है
और रह जाते  है जो किनारे पर
होकर अपवित्र पिंगल वो कहलाते  है
वैकुण्ठ में तुलसी जी
भगवान विष्णु जी के साथ सदा वास पाती है
और है सबसे पवित्र पौधों  में एक धरती पर,
तुलसी जिसको बुलाया जाता है
भगवान शिव के इलावा सब देवताओ की पूजा में
जल शंख से चढाया जाता है
और भगवान शिव के चरनामृत के इलावा
तुलसी का पत्ता हर चरनामृत  में डलता है
करता है ये दूर कई व्याधिया
और कई औषधियों में भी डलता है
इस तरह एक बार भगवान शिव और देवी पार्वती
मन्दराचल पर्वत पर विहार के लिए गये
करते हुए क्रीडा देवी पार्वती ने
भगवान शिव के नेत्र बंद किये
होते ही बंद नेत्र भगवान शिव के
सर्वत्र अँधेरा छा गया
और  माथे पर  भगवान शिव के
कुछ पसीना आ गया


जो बूंदे गिरी जमीन पर उनसे
एक अँधा बालक बाहर आ गया
मगर शरीर उसका बेडोल लगता था
भयंकर था वो, और अजीब सी  हरकते करता था
नाम दिया अंधकासुर उसको
और देखने से उसको डर लगता था
पर देवी पार्वती और शिव ने उसे
अपना पुत्र मान लिया
की देख भाल उसकी और अंधकासुर  नाम दिया
कुछ समय पश्चात हिरण्याक्ष नामक दैत्य ने
पुत्र की इच्छा से  प्रभु शिवजी की तपस्या की
तब दिया अंधकासुर को उसे पुत्र रूप में
और उसकी तपस्या पूर्ण की
इसके इलावा भी उसने
भगवान शिव से और बहुत वर प्राप्त किये
हराकर सब देवताओ आदि को
तीनो लोक जीत लिए
ले गया धरती को रसातल में तो
हर ओर हाहाकार मच गया

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