Thursday, June 9, 2011


 आलस्य,प्रमाद,व्याधि, स्थान भ्रान्ति,
अन्व्यस्थित चित, भ्रान्ति दर्शन, दुःख,
दौर्मनस्य, अश्र्दा और विषय लोलुपता :
 ये दस व्याधिया होती है       
है जो विक्षेप रहित वृति से
प्रभु शिव को ध्याता है
होता ध्याता वो ही है
धारणा है वो
जो किसी ध्यान में स्थित हो जाती है 
है ध्यान वो
जिसमे  ध्येय  के सिवा
वृति कंही नही जाती  है
है ध्येय सिर्फ प्रभु शिव
जो भक्त ध्यान के द्वारा  ही देख पाता है
है ध्यान प्रयोजन
परमात्मा शिव में विलीन होना,
सिर्फ ज्ञानी ही इसे समझ पाता है
प्रथम सविषय ध्यान में ही मन 
स्थित  हो पाता है
करके कल्पना विभिन्न रूपों की
परमात्मा शिव के ध्याता मन की धारणा को
अपने ध्यान के ध्येय परमात्मा में
स्थित कर  पाता है 
है निर्विषय ध्यान वो
जिसमे भक्त परमात्मा शिव के
सूक्ष्म रूप में स्थापित हो जाता है 
नही होती जरूरत उसे
किसी रूप की परमात्मा के 
उसे तो हर जगह हर रूप में
परमात्मा नजर आता है 
और वो करके बंद आँखे  अपनी 
अपने अंदर ही
परमात्मा के दर्शन कर पाता है 
पर जब तक नही होता
निर्विषय ध्यान का अभ्यास
तब तक सविषय ध्यान करते जाओ
और अध्यात्मिक उन्नति की राह पर
निरंतर आगे  चलते जाओ 
चाहे करो याद किसी भी रूप में भगवान को
पर परमात्मा शिव के रूप का ध्यान
अवश्य करते जाओ
और करते करते ध्यान 
अपनी  बुद्धि को
अध्यात्म से नियंत्रित करते जाओ
बुद्धि की किसी धारा की सन्तति को ही
धारणा कहा जाता है
और इस धारणा को
प्रभु चरणों में अर्पित करते जाओ
है प्राणायम से आती
शान्ति, प्रशांति, दीप्ती  और प्रसाद
और है प्राणों के प्रवाह को रोकना
ही है प्राणायाम
है सब आपदाओ   का अंत शान्ति
और सब तमो का अंत प्रशांति
ज्ञान का प्रकाश  ही दीप्ती कहलाता है
और ज्ञान से प्रभु का साक्षात्कार ही
प्रशाद कहा जाता है
ध्यान से ही मिलता है ज्ञान
और ज्ञान से मिलते है प्रभु
योग के बिना ध्यान स्थिर नही होता
और ज्ञान के बिना प्रभु मिल नही सकते
बाहरी कर्मकांडो से भोग तो मिलते है
पर ज्ञान के फूल खिल नही सकते
पाना है अगर मोक्ष और प्रभु को तो
अभ्यन्तर ध्यान के पथ पर चलना होगा
मिलता है जो अधिकार
राजा के अंतपुर में रहने वालो को
और पाना है वो तो
मन के अंदर के परमात्मा तक पहुंचना होगा
महल में रहकर
सेवा करने  वाले  ही
राजा को प्यारे होते है
और मन में हर समय
परमात्मा को ध्याने वाले ही
प्रभु शिव को सदा प्यारे होते है
शिव क्षेत्र  में और शिव भक्ति में लीन रहकर 
मरने वाले भक्त शिव को अति दुलारे होते है
वो ऐसे मरे या वैसे मरे या स्वयम मरे,
वो सदा मोक्ष के अधिकारी होते है
 काशी की तो बात ही है क्या
वहां प्राण त्याग ने वालो के तो
भाग ही निराले होते है
ये है महा शिव पुराण की महिमा
इसे जो पढ़ता है वो पार हो जाता है
और वो प्रसाद में 
प्रभु शिव का दर्शन पाता है
है परमात्मा शिव मेरे को भी
अपने चरणों से लगा लेना
और मेरे  इस शरीर को
 माया से मुक्ति शीघ्र  दिला देना

निवेदक : प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'   

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