और भगवान विष्णु ने ले वराह अवतार
बनाया अंधकासुर को दैत्य राज
और राज्य उसको सौंप दिया
एक दिन भाइयो ने अंधे होने का
अंधकासुर को ताना दिया
तो छोड़ा सब कुछ और तपस्या के लिए चल दिया
की तपस्या हजारो वर्ष ब्रह्मा जी की
और जब हुए प्रगट ब्रह्मा जी तो अमरत्व मांग लिया
जो प्राणी पैदा हुआ उसे जाना ही होगा
ये ब्रह्मा जी ने उसे स्पष्ट किया
तब कहा अंधकासुर ने कि
कोई तो उसकी भी जननी होगी
जब आयेगा कुविचार उसके लिए
मन में अंधकासुर के तभी उसकी मृत्यु होगी
साथ इसके दिव्य चक्षु भी उसने मांग लिए
तथा विभिन्न तरह की सिद्दिया
और बल भी ब्रह्मा जी से प्राप्त किये
पाकर ये सब अंधकासुर अति बल शाली हो गया
ढाने लगा जुल्म हर तरफ
और त्रिलोकी का मालिक बन गया
तभी एक दिन अंधकासुर के गणों ने
माता पार्वती को देख लिया
जा किया उनके रूप का बखान अंधकासुर से
और कुविचार मनमे उसके भर दिया
हो काम से प्रेरित उसने
जा भगवान शिव पर आक्रमण किया
पर होनीवश भगवान शिव तपस्या के लिए थे बाहर
तो माँ पार्वती ने देवो, भगवान विष्णु, भगवान ब्रह्मा
तथा अपनी सभी शक्तियों को बुला लिया
हुआ युद्ध भयंकर शुरू
और हर तरफ कटे हुए शव छा गये
इस बीच करके तपस्या पाशुपत व्रत की
भगवान शिव भी वापिस आ गये
आकर उन्होंने रौद्र रूप धारण किया
लगे मारने दैत्यों को
और उनके बीच हाहाकार मच गया
और घबराकर अंधकासुर लेने को
संजीवनी विद्या की मदद
भर्ग पुत्र दैत्य गुरु शुक्राचार्य के पास भाग गया
समझाया गुरु शुक्राचार्य ने
कि पार्वती तो उनकी माता है
लाना ऐसा विचार भी
उसकी दुर्बुधि को दर्शाता है
मगर अन्धाक्सुर ने दिया दैत्यकुल का वास्ता
और करने को प्रयोग संजीवनी विद्या का
दैत्य गुरु को मजबूर किया
गये रणक्षेत्र में गुरु शुक्राचार्य
और मरे दैत्यों को फिर से जिन्दा करना शुरू किया
देखा जब ये तो भगवान शिव ने और मरे दैत्यों को फिर से जिन्दा करना शुरू किया
तो नंदी जी को ये आदेश दिया
तथा युद्ध क्षेत्र से गुरु शुक्राचार्य को उठवा लिया
पकडकर गुरु शुक्राचार्य को
भगवान शिव ने पूरा का पूरा निगल लिया
तब दैत्यों में मची भगधड और
भगवान शिव और अंधकासुर में भयंकर युद्ध शुरू हुआ
अंत में चलाया त्रिशूल
और हुआ अंधकासुर घायल
तथा उसके आतंक का अंत हुआ
जब नही छोड़े उसने प्राण तो
भगवान शिव ने उसे त्रिशूल पर टांग दिया
अब हुआ एहसास गलती का अपनी
और टंगे टंगे ही अंधकासुर ने
अपनी गलती का एहसास किया
तीन हजार वर्ष तक भूखे प्यासे रहकर
भगवान शिव के १०८ नामो का जाप किया
दूसरी तरफ गुरु शुक्राचार्य १०० वर्ष तक
भगवान शिव के पेट में भटकते रहे
दिखी सारी सृष्टि उन्हें पेट के अंदर
पर बाहर जाने का रास्ता ढूंढते रहे
तब की उन्होंने तपस्या
और महामृत्युंजय मन्त्र का जाप करते रहे
तब भगवान शिव के लिंग से
वीर्य के साथ बाहर आने का रास्ता मिला
क्योंकि वो निकले भगवान शिव के वीर्य से
इसलिए भगवान शिव ने उन्हें शुक्र नाम दिया
पेट में उनकी तपस्या से खुश होकर
भगवान शिव ने उन्हें अपना पुत्र बना लिया
और तीन हजार वर्ष की सजा के बाद
भगवान शिव ने अंधकासुर को भी
अपने त्रिशूल से उतार दिया
किया जो लटके हुए भगवान शिव नाम का तप उसने
उसके फल स्वरूप उसे मांगने को वर कहा
बोला अंधकासुर आप, माता पार्वती,
आपके पुत्र, आपके गण और सब देव
मुझे मेरी कुबुधि और कुविचारो के लिए क्षमा करे
और फिर कभी भूले से भी
ऐसा कुविचार मेरे मन में न आये
कृपया ऐसी कृपा करे
दिया वरदान उसको और अपना उसे आशीर्वाद दिया
तथा उपहार में उसे अपने गण का पद दिया
इस तरह देव हो या दैत्य
सब ही भगवान शिव के बालक है
करता है जो आराधना उनकी
उसके ही वो पालक है
सृष्टि के प्रारम्भ में प्रजापति दक्ष ने
अपनी तेरह कन्याऐ ऋषि कश्यप को ब्याही थी
और थी सबसे बड़ी उनमे दिति
और उसकी सन्तान ही दैत्य कहलाई थी
हिरण्याक्ष और हिरण्य कश्यप उसकी दो बेटे थे
जो थे अति बलशाली
और देवताओ से नफरत करते थे
हिरण्याक्ष का भाई हिरन्य कश्यप
भगवान विष्णु से द्वेषवश उनका विरोधी हुआ
की तपस्या ब्रह्माजी की
और अद्दभुत वर उनसे प्राप्त हुआ
न कोई मानव, न देव, न असुर, न पशु,
न धरती पर, न जल में, न धरा पे, न आकाश में
न अस्त्र से न शस्त्र से
और न दिन में और न रात में
उसे कोई मार न पाए
सोचता था हिरण्य कश्यप कि
शायद वो इस तरह अमर हो जाए
क्योंकि ऐसा वर देकर
ब्रह्मा जी ने उसे अतिबलशाली किया
पाकर वरदान अपनी असुरी प्रवृति के कारण
तीनो लोको को राज उसने हथिया लिया
भगवान विष्णु का नाम भी लेने को
प्रजा को उसने मना किया
जब होने को था बालक उसके घर में
तब देव राज इंद्र ने उसकी पत्नी को उठा लिया
तब हुए क्रोधित देव ऋषि नारद देव राज इंद्र पर
और हिरण्य कश्यप की पत्नी को
देव राज इंद्र से बचा लिया
लाये अपने आश्रम पर
जहाँ एक पुत्र को उस स्त्री ने जन्म दिया
देकर हरी नाम की उत्तम शिक्षा
उस बालक को उन्होंने बड़ा किया
बनकर गुरु उस बालक का प्रहलाद उसको नाम दिया
हो बड़ा वो बालक
अब पिता के घर वापिस आकर भी
हरी के गुण गाता था
नही डरता था गुस्से से पिता के
और उसे भी वो समझाता था
तब हिरन्य कश्यप ने अपनी बहन होलिका को
उस बालक को सौंप दिया
जला डालो इस बालक को
ऐसा उसने आदेश दिया
बच गया प्रहलाद और होलिका स्वयम जल गयी
हुआ निराश हिरन्य कश्यप
और उसकी चाल विफल हुई
तब करने को अंत हिरणय कश्यप का
भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण किया
संध्या समय में अपनी जांघ पर रखकर
बन आधे मानव आधे पशु
अपने नाखुनो से उसका वध किया
दिया आशीर्वाद प्रहलाद को
और सब लोको को आतंक से मुक्त किया
अगली पीढ़ी में थे प्रहलाद
और उसके अन्य भाई माने जाते है
प्रहलाद थे भगवान विष्णु भक्त
और उनके वो चाहेते जाने जाते है
फिर आगे चलके बाली भी उनके वंश में आये
और की पृथ्वी दान
भगवान विष्णु के वामन अवतार को
महादानी वो कहलाये
बाली के ही वंश में बानासुर पैदा हुआ
और की घोर अराधना भगवान शिव की
तथा हजारो हाथो से वरदान में सुशोभित हुआ
वरदान में ही भगवान शिव का परिवार
सहित गणों के साथ अध्यक्ष बनकर
बाणासुर के शहर में जाना हुआ
पा वरदान बाणासुर अति बलशाली हुआ
नित्य करता था वो पूजा भगवान शिव की
और पूरी पृथ्वी का स्वामी हुआ
अब भी वो भगवान शिव की
नित्य आराधना करता था
कभी नृत्य से कभी पूजा से वो
नित्य भगवान शिव को प्रसन्न करता था
फिर गयी मती एक दिन
और उसको होनी वश अभिमान आया
और उसको होनी वश अभिमान आया
और बोला भगवान शिव से कि
क्या करू लेकर मै ये विशाल काया
है शक्ति मेरी हजारो भुजाओ में इतनी क्या करू लेकर मै ये विशाल काया
कि कोई मुझसे युद्ध नही कर पाता है
और बिना युद्ध के
इन हजारो भुजाओ वाला शरीर खुजाता है
इसलिए भगवन कुछ ऐसी कृपा कीजिए
कि खुजली मिटे मेरी
और मेरे से युद्ध करने वाले को तो पैदा कीजिये
या तो वो मेरे हाथो नष्ट हो जायेगा
या फिर मेरे हाथो को काट
इनकी खुजली मिटाएगा
क्रोध आया भगवान शिव को
उसके अभिमान पर
और उसको ये श्राप दिया
गिर जायेगा जिस दिन हवा बिन ध्वज तेरा
उस दिन हो जायेगी तेरे विनाश कि प्रिक्रिया
मिटाने को खुजली तेरी उसके बाद कोई अवश्य आयेगा
जो करेगा नष्ट तेरी इन भुजायो को
और उनकी खुजली मिटाएगा
सुन इतना बाणासुर ने
भगवान शिव को प्रणाम किया
और सोचता हुआ भगवान शिव के वचनों को
चुप चाप अपने महल की और चल दिया
समय के साथ बाणासुर के घर
एक सुंदर सुशील कन्या उषा पैदा हुई
और समय के साथ साथ
वो बड़ी होकर यौवन को प्राप्त हुई
एक दिन रात को स्वप्न में
अनिरुद्ध नामक युवक का दर्शन हुआ
जो था उसके सपनों का राज कुमार
और उसपर उसका मन मोहित हुआ
अब दिन रात उसके ख्यालो से बैचेन रहती थी
और नही जानती थी वो कौन है
और कहाँ है इसलिए उदास रहती थी
हुई उनकी सखी चित्रलेखा परेशान
और और विभिन्न चित्र बनाकर
राजकुमारी को दिखा दिया
और राज कुमारी उषा ने उनमे से
अपने अनिरुद्ध को पहचान लिया
था वो प्रधुम्न का पुत्र
और भगवान कृष्ण का पोता
और द्वारका में वो रहता था
था वो महान योद्धा
और कामदेव सा दीखता था
थी योगिनी चित्रलेखा
और योग बल से रात को
अनिरुद्ध को उसने उठा लिया
और चुपचाप राजकुमारी उषा के
महल में उसे पहुंचा दिया
वहां दोना प्रेमी प्रेम में मग्न रहते थे
कोई चिंता नही थी दीन दुनिया की
और दोनों मस्त रहते थे
बताया जब द्वारपाल ने बाणासुर को
\तो उसने क्रोध में ये निर्णय लिया
और हुआ भयंकर युद्ध अनिरुद्ध से
और छल से उसने नागो से अनिरुद्ध को बाँध लिया
नागो से बंधे अनिरुद्ध ने
जब माँ दुर्गा को याद किया
तो तुरंत आकर काटे पाश उसके
और उषा के महल में उसे पहुंचा दिया
उधर मिली खबर भगवान कृष्ण को
तो उन्होंने तुरंत बाणा सुर पर आक्रमण किया
गिर गयी बिन हवा के पताका
तो बाणा सुर बहुत खुश हुआ
मिटाने को खुजली उसकी
वो घड़ी आखिर आ गयी थी
अब तो भगवान कृष्ण की सेना,
बाणासुर की सेना सामने युद्ध को खड़ी थी
एक तरफ थे अपने भक्त से बंधे भगवान शिव
और दूसरी और भगवान विष्णु (कृष्ण) की सेना डटी थी
हुआ जब शुरू युद्ध तो हर तरफ मार काट मची थी
और हर तरफ था खून का समुन्द्र
और हर तरफ लाशें ही पड़ी थी
तब कहा भगवान विष्णु ने भगवान शिव से की
अब आपके बाणासुर को दिए श्राप को
पूरा करने का वक़्त आ गया है
अब हो जाइये आप इस युद्ध से निर्वृत
अब इसका अहंकार मिटने का वक़्त आ गया है
बोले तब भगवान शिव कि
आप ज्म्ब्राह्न अस्त्र का इस्तेमाल करे
और बांधकर मुझे उस अस्त्र से
मुझे युद्ध से निर्वृत करे
मानकर भगवान शिव की बात
भगवान विष्णु ने ऐसा ही किया
और करके अस्त्र का प्रयोग
भगवान शिव को नीद में सुला दिया
अब भगवान विष्णु और बाणासुर में गहन युद्ध हुआ
और नष्ट हुई सब भुजाये और रह गयी सिर्फ चार
तथा बाणासुर का अहंकार चूर चूर हुआ
जब शीश काटने को भगवान कृष्ण उद्दत हुए
तब समाप्त कर लीला अपनी
और भगवान शिव नीद से जाग गये
आप कभी भी मेरे भक्त पर
सुदर्शन चक्र नही चलाते है
और है हम दोनों एक ही
ये तो देने को शिक्षा जग को हम लीला रचाते है
अब आप क्रोध को त्याग बाणासुर के महल में जाइये
और ख़ुशी ख़ुशी उषा और अनिरुद्ध का विवाह रचाइए
फिर गये भगवान श्री कृष्ण बाणासुर के महल में
और उन दोनों का विवाह करवाया
और इसतरह चूर किया घमंड बाणासुर का
और भगवान कृष्ण और बाणासुर को मिलवाया
इस तरह करके खुश बाणासुर ने
भगवान कृष्ण को विदा किया
दूर हुआ घमंड उसका और
करके आराधना और नृत्य उसने
फिर से भगवान शिव को प्रसन्न किया
हुए प्रसन्न फिर से भगवान शिव
और बाणासुर को क्षमा किया
दिया वर उसको गण का पद
और महा कालत्व प्रदान किया
इसी तरह गजासुर नाम का एक और
अति बल शाली दैत्य हुआ,
मरेगा उससे जिसने हराया हो काम को,
ये वर करके तपस्या उसे ब्रह्मा जी से प्राप्त हुआ
बना अत्याचारी और वो पाकर वर निरंकुश हुआ,
सिर्फ भगवान ही थे काम नाशक इसीलिये
उनके हाथो उसका वध हुआ
फिर बाद मरने के
की उसने भगवान शिव से प्रार्थना
और भगवान शिव ने खाल को उसकी
बना वस्त्र धारण किया
और इस तरह कृतवेश्वर नाम हुआ
इसी तरह दिति के पुत्र दुन्दुभी ने
वाघ्र बन काशी में ब्राह्मणों को खाया था
तब आकर भगवान शिव ने उसे मार गिराया था
जब विटल और उत्पल ने पाकर ब्रह्मा जी से वर
धरती पर उत्पात मचाया था
तब माँ शक्ति ने एक ही गेंद से
दोनों को मार उनका आतंक मिटाया था
१९ वे कल्प में जब ब्रह्माजी को
सृष्टि रचना में समस्या आई थी
तब श्वेत और लोहित वस्त्र धारणकर आये भगवान शिव
और ब्रह्मा जी कि समस्या सुलझाई थी
इसीलिए वो कल्प श्वेत लोहित कल्प कहलाता है
और वो रूप प्रभु शिव का सधोजात रूप कहलाता है
अगले कल्प में फिर वो कहानी दोहराई थी
अब धारण कर लाल वस्त्र प्रभु शिव ने
भगवान ब्रह्मा जी के ज्ञान कि ज्योत जलाई थी
इस कल्प में प्रभु शिव लाल
वस्त्र में आये और वामदेव कहलाये थे
फिर अगले कल्प में कर काले वस्त्र
वो ब्रह्मा जी को ज्ञान देने आये थे
और इस कल्प में अघोर वो कहलाये थे
फिर बदला कल्प और पीताम्बर वस्त्र धारण किये
और उस कल्प में तत्पुरुष नाम से अव्तरित हुए
फिर अगले कल्प उन्होंने स्फ्स्टिक वस्त्र धारण किये
और वो उस कल्प में ईशान रूप में प्रसिद्ध हुए
सधोजात रूप सूंघने कि शक्ति बताता है
और पृथ्वी तत्व को दर्शाता है
वामदेव रूप रसना को समझाता है
और जल रूप में आता है
अघोर रूप नेत्र का स्वामी है
और अग्नि तत्व का ज्ञानी है
तत्पुरुष रूप त्वचा की निशानी है
और वायु की कहानी है
ईशान रूप श्रवण का स्वामी है
और आकाश रूप में सर्वज्ञानी है
है भगवान शिव की शर्व, भव,रूद्र, उग्र,भीम,
पशुपति, ईशान और महादेव अष्टमूर्ति
शर्व पृथ्वी को, भव-जल को, रूद्र अग्नि को,
उग्र वायु को, भीम आकाश को,
सूर्य को पशुपति, ईशान चन्द्रमा को
और महादेव शक्ति को करते है प्रतीक
अलग अलग कल्प के अलग अलग मन्वन्तर में
भगवान शिव अवतार लेते होते है प्रतीत
करने को मदद व्यास जी
और उनके ४ पुत्र शिष्य रूप में हुए
इस तरह २८ कल्प में २८ व्यास हुए औरऔर उनके ४ पुत्र शिष्य रूप में हुए
बताने को रास्ता भगवान शिव के
२८ अवतार और उनके ११२ पुत्र हुए
अब नंदी अवतार की तरफ आते है
एक थे शिलाद मुनि आपको ये बताते है
की घोर तपस्या उन्होंने
और जब भगवान शिव और पार्वती ने दर्शन दिए
माँगा वर की आपकी तरह
अजन्मा, बिन योनी पुत्र मेरे को भी मिले
कहा भगवान शिव ने कि
ऐसा ही जरूर सम्भव हो पायेगा ,
समय आने पर घर तुम्हारे
मेरा पुत्र रूप में जन्म हो जायेगा
एक दिन जब मुनि शिलाद
पूजा की तैयारी करते थे
तभी प्रगट हुए उनके शरीर से एक बालक
जो एकदम भगवान शिव लगते थे
नाम उनका रखा नंदी
वो ५ वर्ष में ही सब वेदों का अध्यन पूरा कर
पूर्ण विद्धवान दीखते थे
पर तब एकदिन शिव लीला से
दो मुनि वहां प्रगट हुए
और बताया बालक नंदी की आयु एक वर्ष दो मुनि वहां प्रगट हुए
और मुनि शिलाद अति चिंतित हुए
तब बालक नंदी ने दी दिलासा और कहा
कि ऐसा कोई पैदा नही हुआ
जो मेरी मृत्यु का कारण बने
दी दिलासा माता पिता को और
तब नंदी जी वन को चले गये
की कठोर तपस्या भगवान शिव की
और भगवान शिव खुश होकर प्रगट हुए
उनको दिया अमरत्व का वरदान
और गणाध्यक्ष पद पर वो नियुक्त हुए,
करवाई सुयशा से शादी
और देवी पार्वती की कृपा से
उनको भी अमरत्व और अन्य वरदान प्राप्त हुए
साथ ही उनके पिता और पितामह भी
अमरत्व को प्राप्त हुए
और इस तरह नंदी जी भगवान शिव के
हमेशा के लिए समीप हुए
ऐसे ही ऋषि विश्वानर हुए
जिनकी पत्नी शुचि मती थी,
ऋषि ने पत्नी की करने को पूर्ण इच्छा
अति घोर तपस्या की
बदले में पाया वर की
होंगे पैदा घर उनके बनके पुत्र परमात्मा शिव
और समय आने पर परमात्मा शिव
उनके घर बनके पुत्र पैदा हुए
ब्रह्मा जी उनका नाम गह्रपति रखा
और वो समय के साथ बड़े हुए
आये एक दिन देव ऋषि नारद और
उनकी जान को १२ वर्ष की उम्र में
खतरा होगा ऐसा उनको बता गए
हुए दुखी माता पिता और उनका दुःख दूर करने
गह्रपती करने तपस्या काशी गये
करके दर्शन भगवान विश्वनाथ जी के
एक लिंग उन्होंने स्थापित किया
की घोर तपस्या उन्होंने
और परमात्मा शिव ने उनको दर्शन दिया
पहले वो देव राज इंद्र के रूप में आये
पर गह्र पति जी नही भरमाये
जब इंद्र रूप में भगवान शिव ने
उन्हें बिजली और अग्नि से डराया
कहा तब गह्र पति ने
उन्होंने तो सिर्फ भगवान शिव को है बुलाया
तब भगवान शिव ने अपना असली रूप दिखाया
और दिया वरदान उनको और दिक्पाल पद पर बिठाया
कहा साथ ही की जो गह्र पति जी की पूजा करेगा
उन्हें अग्नि और विधुत का भय कभी तंग नही करेगा
उनके बनाये शिवलिंग में
परमात्मा शिव ने प्रवेश किया
और अग्निश्वेर लिंग उसको नाम दिया
अग्नि के मालिक अब गह्र पति जी माने जाते है
और साथ ही साथ वो काल भैरव भी कहलाते है
अध्यात्मिक नगर काशी में वो
नगर कोतवाल जाने जाते है
काल भैरव जी की पूजा
नगर कोतवाल के रूप में की जाती है
और जो नही करता उनके दर्शन
उसकी यात्रा सफल नही मानी जाती है
काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के साथ
जब करो काल भैरव के दर्शन
तभी यात्रा सफल हो पाती है
नही तो काशी विश्व नाथ जी की यात्रा
अधूरी ही मानी जाती है
भगवान शिव के दस अवतार -
महाकाल, तारा ,बाल भुवनेश ,शोडष
श्री विदवेश, भैरव छिन्म्स्तक,धूम्वान ,
बगुलामुख और मातंग कमल, है
शक्तिया इनकी देवी महाकाली, तारादेवी, भुवनेश्वरी,
षोडशी, विध्वेश्वरी, भैरवी, चिन्न्मस्तिका, धूम्व्ती
बगुलामुखी, मातंगी और कमला है
हराया जब एक बार दैत्यों ने देवो को
तो वोअपने पिता ऋषि कश्यप की शरण में चले गए
की विनती उनसे
और वो काशी में भगवान शिव की पूजा को चले गए
पाया पुत्रो(देवताओ) के लिए वरदान
और उनके घर ११ रूद्र पैदा हुए
की रक्षा देवो की
और देवता फिर से स्वर्ग में स्थापित हुए
इस तरहऋषि अत्री की तपस्या से प्रसन्न होकर
ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनो प्रगट हुए
ब्रह्मा जी ने चन्द्रमा को
पुत्र रूप में उनको वरदान दिया,
श्री दत्त बने उनके पुत्र
भगवान विष्णु की कृपा वर प्राप्त हुआ
भगवान शिव के वरदान स्वरूप
ऋषि दुर्वासा अवतार बनकर उनके यहाँ
पुत्र रूप में जन्म हुआ
की लीला ऋषि दुर्वासा ने
कभी ली परीक्षा श्री राम की,
कभी कभी अम्बरीश का परिक्षण किया
और कभी तो भगवान श्री कृष्ण को
रुकमनी जी सहित रथ में जोत दिया
इसी तरह करने को कार्य श्री राम के हनुमान रूप में जन्म लिया
कर लीला भगवान शिव ने
जब देख मोहिनी रूप भगवन विष्णु का
तो अपना वीर्यपात किया
लिया उसे सम्भाल सप्त ऋषियों ने
और माता अंजनी के कान के द्वारा स्थापित किया
तब बन प्रभु शिव का अंश अवतार
भगवान हनुमान रूप में जन्म लिया
और खेल खेल में ही उन्होंने सूर्य देव को
गेंद समझ कर निगल लिया
और जब की प्रार्थना देवो ने
तब उन्होंने उन्हें छोड़ दिया
अति बलशाली वो संकट मोचन कहलाये,
बचाई जान श्री लक्ष्मण की
और भगवान शिव के अंशावतार वो कहलाये
तीनो देवो की एक दुसरे के प्रति सम्मान की
ये अद्दभुत कहानी है
कभी दण्ड करन्य में करते है
भगवान शिव प्रणाम श्री राम ( भगवान विष्णु के अवतार) को
इसी तरह रामेश्वरम में श्री राम द्दारा पूजा शिवलिंग
की ये लगती कितनी सुहानी है
एक समय जब दैत्य वत्रासुर ने
देवताओ को पराजित किया
तब पहुंचे देवता भगवान ब्रह्मा जी के पास
और उनसे परामर्श लिया
भगवान ब्रह्मा जी ने कि जाओ ऋषि दधिची के पासऔर उनको ये राज़ बताया था
कि कर भगवान शिव की कठोर तपस्या
अपनी हड्डियों को ऋषि दधिची ने वज्र बनाया था
गये इंद्र सहित सब देवता ऋषि दधिची के पास
और आता उनको देख
ऋषि ने उनका मकसद जान लिया
इसीलिए बता कोई कार्य उन्होंने
अपनी पत्नी को आश्रम से दूर भेज दिया
पूछा देवताओ से
उनके आने का कारण और जान कारण
देनेको अपनी हड्डिया
उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया
की शरणागत की रक्षा
और शिवलोक को प्राप्त किया
बनाये देवताओ ने उनसे अस्त्र
और वत्रासुर का वध किया
आई जब ऋषि पत्नी
और उसे यह समाचार मिला,
हुई क्रोधित वो
और देवताओ को पशु होने का श्राप दिया
और अब तो ऋषि पत्नी ने
पति लोक जाने की ठान ली
तथा होने को सती अपने लिए
एक चिता तैयार की
तभी हुई आकाश वाणी
और ऋषि पत्नी को ये आगाह किया
की गर्भ वती है वो
और ऐसी स्थिति में सती होने को मना किया
तब ऋषि पत्नी ने होने को सती
अपने गर्भ को पत्थर से फोड़ दिया
एक बालक तेजवान
जो था भगवान रूद्र का अवतार वो प्रगट हुआ
रख कर नाम उसका पिप्पलाद
ऋषि पत्नी ने शिवलोक को प्रस्थान किया
की ऋषि पिप्पलाद ने कठोर तपस्या
और उनको ये वरदान मिला
की जो भी उनकी शरण में आयेगा
उसे ग्रह श्रेष्ठ शनिदेव का प्रकोप कभी नही सताएगा
लेते भी है परीक्षा अपने भक्तो कि
भगवान शंकर कभी कभी
ऐसे ही जंगल में जब गये
राजा भद्रायु और उनकी पत्नी
तब ब्राह्मण बने भगवान शिव
और देवी पार्वती ब्राह्मणी बनी
माया का एक व्याघ्र बनाया
और खुद ही उसे अपने पीछे भगाया
सामने जब राजा भद्रायु आया
तो ले ब्राह्मणी को मुह में उसे भगाया
राजा के बाण भी काम न आ सके
और राजा ब्राह्मणी को न बचा सके
तब राजा को खूब ब्राह्मण ने फटकारा
और रानी को ब्राह्मणी के बदले में माँगा
राजा ने ब्राह्मण को उसका धर्म बताया
और है परस्त्री को छूना घोर पाप ये उसे जताया
पर ब्राह्मण अपनी बात पर अड़ा रहा
और ब्राह्मणी के बदले लेगा रानी
इस बात पर वो डटा रहा
आखिर राजा ने रानी ब्राह्मण को देने कि मान ली
और खुद अग्नि समाधि लेने कि ठान ली
जब सौंपकर रानी
खुद राजा ने अग्नि समाधि लेने की कोशिश की
तब प्रगट हुए प्रभु शिव
और राजा कि बांह थाम ली
दिया वर उसे मुह माँगा और राजा कि बांह थाम ली
कि वो पितरो और परिवार सहित
बाद मरने के शिव लोक में जायेगा
और फिर वंही रहकर
शिव सेवा में समय बिताएगा ,
ऐसा कर भगवान ने अपने भक्त का कल्याण किया
और अपने इस अवतार को
द्दिजवेश्व्ररा अवतार नाम दिया
एक भील था बहुत भक्त, था
नाम उसका आहुक था,
वो अपनी पत्नी सहित वन में रहता था
वो था बहुत शिव भक्त,
सदा प्रभु शिव के गुण गाता था,
एक दिन प्रभु शिव बन यती उसके घर गए,
उससे रात के लिए शरण मांग ली
और भील दुविधा में पड़ गये
किया भील ने निश्चय धर्म पालन का
और यती को और पत्नी को घर के अंदर जगह दी
और खुद घर के बाहर द्वार पर
सोने की जगह बना ली
शिव इच्छा से रात को
मायावी जानवरों ने उसे खा लिया
और सुबह जब देखा भीलनी ने तो
होने को सती उसने निश्चय किया
जब सजाई चिता
और अग्नि प्रवेश करने लगी
तब हुए प्रगट प्रभु शिव
और खत्म उनकी परीक्षा हुई
दिया वरदान उनको कि
अगले जन्म में भील नल
और भीलनी दमयन्ती बनेगे
और भोगेगे राज सुख
और भगवान शिव बनके हंस प्रगट होगे,
देकर ये वरदान
भगवान शिव वंही लिंग में प्रवेश किया
और उस लिंग को
अचलेश्वर नाम दे दिया
अलग अलग कल्प, मन्वन्तर और युग में
प्रभु शिव वो ही कहानी दोहराते है
लेते है अवतार विभिन्न रूप में
और अलग अलग नाम से जाने जाते है
एक बार जब मनु श्राद देव हुए
और उनके नवे पुत्र नभाग हुए
तब लेने को शिक्षा गुरुकुल में
नभग ने जब प्रस्थान किया
और पीछे से भाईयो ने
राज आपस में बाँट लिया
नही रखा कुछ भी नभग के लिए
और जब वापिस आकर माँगा उन्होंने हिस्सा
तो हिस्से में पिता को उन्हें सौंप दिया
जब चला पिता को पता
तो उन्होंने नभग को दिलासा दी
और एक जगह हो रहा था ब्राह्मणों का महायज्ञ
उसमे उन्हें जाने कि आज्ञा दी
उस यज्ञ में हर छठे दिन में
मन्त्र का उच्चारण गलत हो जाता था
और यज्ञ उनका इसलिए
वंही असफल हो जाता था
गये नभग वहा पर
और छठे दिन का उच्चारण उन्होंने ठीक किया
और हुआ यज्ञ सफल गये स्वर्ग को ब्राह्मण
और बचा हुआ यज्ञ का धन
उन्होंने नभग को दक्षिणा में दे दिया
तभी प्रगट हुए शिव भगवान
जिनकी थी आँखे श्याम
और बचा हुआ यज्ञ भाग
उन्होंने नभग से मांग लिया
उस यज्ञ के भाग को लेकर विवाद ने
दोनों के बीच जन्म लिया
तब गये नभग जब पिता के पास
तो पिता ने भगवान शिव कि लीला को जान लिया
कहा उन्होंने नभग से कि
वैसे तो भगवान शिव है त्रिलोकी के मालिक
पर यज्ञ का बचा हुआ भाग
भगवान रूद्र को अर्पित किया जाता है
जाओ पकड़ लो पाँव उनके
अरे वो ही तो इस विश्व के विधाता है
आये नभग और
पाँव भगवान शिव के उन्होंने पकड़ लिए
और भगवान शिव ने
उन्हें मुक्ति के वरदान दिए
हुए अंतर ध्यान और
उन्होंने इस तरह नभग को कृतार्थ किया
और अपने इस अवतार को
कृष्ण दर्शन अवतार नाम दिया
एक समय देवराज इंद्र संग ले
गुरु ब्रहस्पति को भगवान शिव के दर्शन को गये
लेने को परीक्षा भगवान शिव
लेकर अवधूत (निरवस्त्र ) अवतार रास्ते में खड़े हो गये
देख रास्ते में खड़ा उनको
देवराज इंद्र क्रोधित हो गये
और उनको डांट कर
रास्ते से हटने को कहने लगे
जब कहे उन्होंने दुर्वचन तो
भगवान शिव आँखों से क्रोध की अग्नि से जलाने लगे
अब घबराए सब और
गुरु ब्रहस्पति हाथ जोड़ कर विनती
भगवान शिव को मनाने लगे
कहा उन्होंने भगवान क्योंकि भक्तवत्सल है आप
तो आप हम पर कृपा करिये तथा कृपया अपने क्रोध की
ज्वाला को आप शांत करिये
तब भगवान शिव शांत हुए
और मुस्कराकर ये समाधान दिया
कि छोड़ी हुई आग तो अब वापिस नही जा सकती
मगर बचाने को देवराज इंद्र को
उन्होंने उस आग को क्षार समुंदर में भेज दिया
वहां जाकर वो अग्नि एक बालक बना
और समुन्द्र मंथन के वक़्त वो प्रगट हुआ
तथा उस बालक का नाम जलंधर पड़ा
और आगे चलकर दिलाने को उससे देवताओ को मुक्ति
भगवान शिव को उसका वध करना पड़ा
एक बार पाण्डेय देश के राजा
छोड़ बीच में भगवान शिव की प्रदोष पूजा
अपने शत्रु को मारने को उठ खड़े हो गये
नही की पूजा पूरी और मारकर अपने शत्रु को
राजकुमार सहित बिना पूजा किये ही
खाना खाकर सो गये
अगले जन्म में वो राजा सत्यव्रत बने
और करने के बावजूद शुभ कर्म
अपनी पिछली गलती के कारण
वो अपने दुश्मनों के हाथो मारे गये
रानी भागी महल से
और जंगल में दे जन्म एक लडके को
वो भी पीते हुए जल
एक ग्रास से मारी गयी
तब भगवान शिव ने बनकर सन्यासी
उस नन्हे बालक की रक्षा की
और भेजा एक विधवा ब्राह्मणी को
और उसको उसकी जिम्मेदारी सौंप दी
उस ब्राह्मणी ने पाला उस बालक को
साथ अपने बच्चो के
और अपने बच्चो की तरह उसको
पूजा की उसको शिक्षा दी
हुई उस बालक की एक गन्धर्व राजकुमारी से शादी
और भोग के सुख जीवन के सारे अंत में
उसको मोक्ष कि प्राप्ति हुई
क्योंकि बनके एक सन्यासी
उन्होंने बालक को था बचाया
इस लिए यह अवतार भगवान शिव का
भिक्षुर्वा अवतार कहलाया
अब हम महात्मा उपमन्यु की कथा पर आते है
और कैसे मिला उनको दूध का सागर
आपको यह कथा बतलाते है
बालक उपमन्यु बचपन से ही मामा के घर रहते थे
और जो भी रूखा सूखा मिलता था उसे ही वो खाते थे
एक बार जब दूध की जिद करने पर
माँ ने उन्हें बीजो को पीस कर पिला दिया
तब बहुत दुखी हुए वो
और पाने को दूध उन्होंने
भगवान शिव की पूजा करने का निश्चय किया
गये हिमालय पर वो
और कठिन उन्होंने वहां तपस्या की
तब बनके इंद्र और उनकी पत्नी
भगवान शिव और माँ पार्वती ने उनकी परीक्षा ली
इंद्र रुपी भगवान शिव से भी
जब उन्होंने शिव भक्ति मांग ली
और करने पर जब शिव निंदा उन्होंने
या इंद्र की जान लेने या अपनी जान देने की ठान ली
तब भगवान शिव ने
अपने असली रूप में मुनि उपमन्यु को दर्शन दिया
और वरदान में उनको
दूध आदि का सागर दिया
साथ में पूरे कुल को ही
अक्षय होने को वर दिया
तथा विभिन्न विधायो का भी उन्हें ज्ञान दिया
तथा माँ पार्वती सहित भगवान शिव ने
दे गणों का अधिपत्य पद उन्हें अपना पुत्र मान लिया
इस अवतार को
भगवान शिव के सुरेशवावतार नाम दिया
दुर्योधन ने हराकर जब पांड्वो को
उन्हें वन में वनवास को भिजवा दिया
और पीछे पीछे उनके ऋषि दुर्वासा को
भी लेने को परीक्षा उनके पीछे भिजवा दिया
माँगा जब उन्होंने भोजन तो द्रोपदी की प्रार्थना पर
भगवान कृष्ण ने
उनसब ऋषियो को पत्ते से संतुष्ट कराया
तब समझाया श्री कृष्ण ने
कि करो भगवान शिव की पूजा
और करने को पूजा उन्होंने
अर्जुन को इन्द्रकील पर्वत पर भिजवाया
की कठोर तपस्या और प्रथम प्रगट हुए इंद्र
और उन्होंने अर्जुन को शिव पूजा का मन्त्र बताया
तब शुरू की पूजा अर्जुन ने
मगर दुर्योधन को ये न सुहाया
भेजा मूक दैत्य को और उसे शूकर बनाया,
देखा जब आता उसे अपनी ओर
तो अर्जुन ने उसपर बाण चलाया
उधर भगवान शिव ने देखा जब
मुश्किल में अर्जुन को तो उन्होंने भील का वेश बनाया
और जब चलाया अर्जुन ने अपनी रक्षा में बाण तभी
भगवान शिव ने भी बचाने को अर्जुन को
उस शूकर पर बाण चलाया
दोनों बाण लगे शूकर को
और वो मौत के मुंह जा में समाया,
तभी परीक्षा लेने का विचार
प्रभु शिव के मन में आया
भेजा बनाकर अपने गण को अपना दूत
और अपना तीर वापिस मंगवाया
हुआ विवाद दूत और अर्जुन के बीच
और दूत फिर लेकर युद्ध का संदेश वापिस आया
अर्जुन ने की भगवान शिव को
पैरो से उठाकर घुमाने की कोशिश
क्योंकी वो भगवान शिव को नही पहचान पाया
ज्यो ही उसने पैरो को छुआ
त्यों ही प्रभु शिव ने उसे अपना दिव्य रूप दिखाया
झुक कर किया प्रणाम
और कर स्तुति गान भगवान शिव का
और वरदान में उसने पाशुपत अस्त्र
तथा साथ ही विजय श्री का आशीर्वाद पाया
ये ही अवतार भगवान शिव का कृतावतार कहलाया
अब परमात्मा शिव के
बारह ज्योतिलिंग की कथा आती है
जो करती है कृतार्थ भक्तो को
और जो मानव जीवन की नैया पार लगाती है
प्रथम ज्योतिलिंग है सोमनाथजी,
दूसरा है मलिकार्जुन जी, तीसरा है महाकालेश्वर जी ,
चौथा है औंकारेश्वर जी , पांचवा है केदारेश्वर जी,
छठा है त्र्म्भकेश्वेर जी , सातवा काशी विश्वनाथ जी है,
आठवा वैजनाथ जी और नौवा भीमाशंकर जी
तो दसवा नागेश्वर जी , ग्यारवा रामेश्वर जी
तथा बारवा घुशमेश्वर जी है,
उनके उपलिंग अंतकरेश्वर, रुद्रेश्वेर,कर्दमश्वेर,
दुग्देश्वर, भीमेश्वर, भूतेश्वेर, वाघेश्वेर है
इस तरह जब ऋषि अत्री की पत्नी अनसूया ने
अपनी एक वर्ष की शिव तपस्या
और पतिव्रता धर्म गंगा जी को दान दिया था
तब गंगा जी और भगवान शिव ने
वंही रहकर उस तीर्थ का नाम अत्रिश्वर किया था
इसी तरह जब ब्रह्मिनी ऋषिके
जो की बाल विधवा थी और शिव भक्ति में लीन रहती थी
करती थी ब्रह्मचर्य का पालन
और प्रभु शिव की सेवा में रहती थी
तभी दैत्य मूड की नजर उस पर पड़ी
और उसने काम वासना से पीड़ित होकर
उसकी इज्जत लूटनी चाही थी
तब पुकारा ब्रह्मिनी ने प्रभु शिव को
और सुन उसकी विनती प्रगट हुए भगवान शिव
और दैत्य को भस्म कर उसकी इज्जत बचाई थी
बचाया ब्रह्मिनी को
और वर में वंही शिव लिंग में रहने का वचन दिया
और इस शिव लिंग को नंदिकेश्वर नाम दिया
तभी आन देवी गंगा ने भी ब्रह्मिनी को वचन दिया
कि आएगी हर वर्ष बैशाख की शुक्ल सप्तमी को नर्मदा में
धोने पाप को पाप जो पूरे वर्ष इंसान ने है उनको दिया
इसी तरह प्रजापति दक्ष ने
अपनी २७ कन्याये चन्द्रमा से ब्याही थी
पर उनमे से रोहिणी ही उनको सबसे अधिक भायी थी
कई बार समझाया प्रजापति दक्ष ने
पर ये बात चन्द्र देव को समझ न उनको आई थी
तब दिया श्राप पर ये बात चन्द्र देव को समझ न उनको आई थी
और क्षय रोग की व्याधि चन्द्रमा के शरीर पर आई थी
मचा चारो और हाहाकर और ब्रह्मा जी ने
चन्द्रमा को जा प्रभास क्षेत्र में
शिव पूजा और तपस्या की विधि सुझाई थी
मान बात गये चन्द्रमा प्रभास क्षेत्र में
और बना शिवलिंग कठिन तपस्या की विधि अपनाई थी
हुए प्रगट प्रभु शिव
और दे वरदान उनकी क्षय रोग की बीमारी दूर भगाई थी
पर १५ दिन घटने
और १५ दिन बढने की शर्त उनपर लगाई थी
और इस तरह चन्द्रमा पर उन्होंने कृपा बरसाई थी
उसदिन से ये शिव लिंग
प्रथम ज्योति लिंग सोमनाथ जी कहलाता है
और ये भारत के गुजरात क्षेत्र में आता है
है एक कुण्ड यंहा पर कहते है जो इसमें नहाता है
होते है पाप दूर उसके और वो निर्मल हो जाता है
तथा जो ६ महीने लगातार इसमें नहाता है
उस प्राणी का क्षय रोग भी हमेशा के लिए दूर हो जाता है
इस तरह जब कार्तिक्य जी और
गणेश जी में शादी को लेकर विवाद हुआ
गये कार्तिक्य जी पृथ्वी की परिकर्मा को
और गणेश जी ने कर माता पिता की परिक्रमा
अपनी शर्त को पूरा किया
इस तरह जीत गये शर्त गणेश जी
और उनका कैलाश पर विवाह हुआ
आये जब कार्तिक्य जी और चला पता उन्हें
तो उनका मन बहुत निराश हुआ
होकर नाराज उन्होंने
क्रोंच पर्वत की तरफ प्रस्थान किया,
जब भगवान शिव और देवी पार्वती गये मनाने
पर तो भी वो नही माने
और १६ किलो मीटर दूर और प्रस्थान किया
तब भगवान शिव और देवी पार्वती ने ये निश्चय किया
और उन दोनों ने मिलकर वहां मलिकार्जुन में
ज्योतिलिंग और शक्तिपीठ के रूप में
शिवलिंग में स्वयम को स्थापित किया
अब हर अमावस को भगवान शिव
और पूर्णिमा को देवी पार्वती वहां पर आते है
और अपने पुत्र भगवान कार्तिक्य से
मिलकर अपना प्यार उनपर लुटाकर जाते है
इस तरह वेद प्रिय नाम के एक ब्राह्मण
उज्जैन नगरी में रहते थे
करते थे सब धार्मिक कर्म
और शिव पूजा में लीन रहते थे
हुए चार पुत्र उनके
और चारो ही
महान शिव भक्त कहलाते थे
करते हुए शिव पूजा उनको दिव्य तेज प्राप्त हुआ
उसी समय दूषन नाम का दैत्य
पाकर वर ब्रह्मा जी से बहुत अधिक शक्तिशाली हुआ
घेर लिया उसने उज्जैन नगरी को
और उस पर उसने आक्रमण किया
घबराकर सब उन चारो शिव भक्तो के पास गये
बताई बात सारी और पूछा की अब बताइए क्या करे
दी सलाह सबको
और खुद भी वो चारो शिव पूजा में लीन हो गये
तभी किया प्रवेश दैत्य ने प्रवेश नगर में
और प्रजा पर अत्याचार होने लगे
पर जब उन ब्राह्मण पुत्रो को मारने को
वो आगे बडा और उनपर संकट मंडराने लगे
तब हुई एक भयंकर ध्वनी
और हुआ एक विशाल गडडा
और भगवान शिव वहाँ प्रगट हुए
किया अपनी हुँकार से भस्म उस दैत्य को
और वंही ज्योति लिंग रूप में स्थापित हुए
ये ज्योति लिंग कालो का भी काल कहलाता है
इसलिए जगत में
ये महाकाल ज्योतिलिंग के नाम से जाना जाता है
है महा कालेश्वर का महत्त्व बहुत,
एक समय में उज्जैन में चन्द्रसेन राजा हुए थे
थे बहुत प्रतापी, शिव भक्त
और शिव पार्षद मनीभद्र जी के वो प्रिय थे
खुश होकर मणिभद्र जी ने
दी एक मणि उनको, जो की उनको बहुत प्यारी थी
क्योंकी थी वो चमत्कारी
और जिसकी लीला बड़ी न्यारी थी
सुन कीर्ति उस मणि की पड़ोसी राजा परेशान हुए
हो इकठे घेर कर उज्जैन को राजा चन्द्र सेन को
हराने को वो सब उद्दत हुए
देख आपति राज्य पर पाने को शक्ति राजा चन्द्रसेन
महाकाल जी के मन्दिर में शिव पूजा में लीन हुए
तभी एक दिन अन्य प्रजा गणों के साथ
एक विधवा ब्राह्मणी
और उसका लड़का भी उस पूजा में शामिल हुए
पा प्रेरणा वो बालक भी
प्रभु शिव को अराध्य मानने लगा
और घर जाकर मान एक पत्थर को शिव लिंग
पास के जंगल में राजा की तरह
उस की पूजा करने लगा
तभी उसकी माँ भोजन के लिए उसे बुलाने आई
और जब वो नही उठा पूजा से तो
उसकी उसने पिटाई लगाई
पर जब फिर वो नही माना तो
शिव लिंग समेत सब पूजा के फूल इत्यादि फेंकर
छोड़ पुत्र को वंही गुस्से में वो घर वापिस आयी
उधर पूजा ने कर पाने से रोते रोते
उस लड़के को दुःख से थी मूर्छा हो आई
पर जगा जब वापिस तो
उसी जगह पर पाकर एक स्वर्ण मन्दिर
और उसमे देख एक रत्नमयी शिवलिंग पर
अपनी उस पूजासमग्री
वो बालक आश्चर्यचकित हो गया
कर पूजा भगवान शिव की
जब वो वापिस अपने घर गया
देखा माता को सुंदर पलंग पर
और झोपड़े की जगह महल में
वो भगवान शिव का गुणगान कर नतमस्तक हो गया
उठाया उसने माता को
और राजा चन्द्रसेन को इसकी सूचना दी
आये राजा वहां पर
और आकर उन्होंने वहां पर भगवान शिव की पूजा की
लगा पता प्रजा को
और दुश्मन राजाओ के पास भी ये बात पहुंच गयी
डर गये वो कि
जिस राजा का एक प्रजाजन ऐसा शिव भक्त है
तो वो राजा कैसा शिव भक्त होगा
उस शिव भक्त राजा से लड़ने पर
भगवान का क्रोध कितना भयंकर होगा
वो आये राजा चन्द्र सेन के पास
और उससे उन्होंने माफ़ी मांग ली
और कर भगवान शिव की उन्होंने स्तुति
उस राजा से उन्होंने दोस्ती गांठ ली
तभी प्रगट हुए भगवान हनुमान जी
और शिव भक्त उस बालक को
उन्होंने शिव भक्ति की शिक्षा देकर
उसे अपना शुभ आशीर्वाद दिया
साथ ही वर देकर उसे
उस जंगल में गोपो को राजा नियुक्त किया
साथ ही उसके वंश की आठवी पीढ़ी में होंगे नन्द बाबा
और आयेंगे भगवान कृष्ण बालक बन
ऐसा उनको वर दिया
साथ ही उस बालक का
श्रीकर नाम रख दिया
और इस तरह इस कथा ने
महाकालेश्वर की महिमा का
सर्वत्र गुणगान फैला दिया
प्रभु शिव का चौथा ज्योतिलिंग है औंकारेश्वर
जो की विंध्यांचल पर्वत में सिथापित हुआ
है कथा उसकी इस तरह
एक बार विन्ध्याचल पर्वत को
अपने उपर अभिमान हुआ
और देव ऋषि नारद को
उसके इस अभिमान का एहसास हुआ
तब नारद जी ने बताई
विशालता उसे मेरु पर्वत की
तो विन्ध्याचल पर्वत पाने को वर
भगवान शिव की तपस्या में मग्न हुआ
उनकी तपस्या से भगवान शिव वंहा प्रगट हुए
दिया वरदान विन्ध्याचल पर्वत को
और उस शिव लिंग में वंहा स्थापित हुए
हुआ विभाजित दो भाग में वो शिव लिंग
एक औंकारेश्वर और दूसरा परमेश्वर कहलाया
और इस तरह की कृपा विन्ध्याचल पर्वत पर
और उन्हें अपनी सच्ची भक्ति का रास्ता दिखालाया
जब देवस्थान बद्रीनाथ में
नर और नारायण भगवान के दो अवतार हुए
तब उनकी प्रार्थना पर करने को पूरी उनकी पूजा
परमात्मा शिव उनके बनाये शिवलिंग में
बनके ज्योति लिंग सदा के लिए स्थापित हुए
वो नर-नारायण अवतार भगवान विष्णु का
बद्रीनाथ अवतार कहलाया
और ये ज्योति लिंग ही भगवान शिव का
केदारनाथ धाम कहलाया
इस तरह भीम नाम का राक्षस
जो कुम्भकर्ण और कर्कटी का बेटा कहलाया था
कर तपस्या भगवान ब्रह्मा की उसने
होगा वो महाबली ये वरदान पाया था
पा वरदान उसने अपना आतंक मचाया था
और हरा देवताओ को उसने
सम्पूर्ण त्रिलोकी पर अपना अधिकार जमाया था
राजा सुदक्षिण को हरा उसने उनको बंदी बनाया था
कर भगवान शिव की पूजा कारागार में भी
राजा ने भगवान शिव का आशीर्वाद पाया था
जब पता लगा भीम को तो
वो करनेको भंग पूजा राजा को मारने आया था
की उसने जैसे ही कोशिश शिव लिंग को नष्ट करने की
तो भगवान शिव ने अपना रौद्र रूप दिखाया था
हुआ भयानक युद्ध उनमे
और आखिर अपनी हुंकार से ही
भगवान शिव ने
भीम दैत्य को जलाकर राख बनाया था
ये अवतार भगवान शिव का भीमेश्वर अवतार
और ये उनका ज्योति लिंग भीमा शंकर कहलाया
काशी की महिमा तो हर कोई जानता है
ये है पातक नाशनी नगरी हर कोई ये मानता है
जब कुछ नही था जगत में
तब एक से दो होने की इच्छा परमात्मा में जागी
हुए प्रगट परमात्मा साम्ब सदाशिव से
भगवान शिव साकार रूप में
और खुद में से शक्ति उपजा दी
शिव और शक्ति है एक
वो दोनों सम्मलित रूप में अर्धनारीश्वर कहलाते है
और वो दोनों मिलकर ही
इस सृष्टि को सुचारू रूप से चलाते है
शिव शक्ति ने अपने में से
पुरुष और प्रकृति को प्रगट किया
और रहने को उनके लिए
पांच कोस का एक धरती का टुकड़ा बना दिया
और उस टुकडे को आगे चलकर
पंच कोसी नाम दिया
पंच कोसी नाम दिया
और वही रहकर उस पुरुष
यानि भगवान विष्णु ने की तपस्या
और अपनी कर्म भूमि बना दिया
उस तपस्या से उनके शरीर से नीर निकल गयायानि भगवान विष्णु ने की तपस्या
और अपनी कर्म भूमि बना दिया
और उस पुरुष (भगवान विष्णु) को
नारायण नाम मिल गया
देख नीर को थे परेशान भगवान विष्णु
और जोर से उन्होंने सिर हिलाया
गिरी मणि कानो से उनके
और वो स्थान मणीकर्ण कहलाया
बाद उसके उस नीर में रहकर
उन्होंने विश्राम फरमाया
और जब थे निंद्रा में वो
तब उनकी नाभि से एक कमल भी निकल आया
और उस कमल को भगवान ब्रह्मा जी ने
अपना जन्म स्थल बनाया
ब्रह्मा जी ने की रचना सृष्टि की
और ये ब्रह्मांड रचाया
और ब्रह्माण्ड में चौदह भवन बनाये
और पृथ्वी पर हर तरह के
मानव, जीव - जन्तु और पेड़ पौधे उपजाए
उस पंच कोसी को
जिसे भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल पर उठाकर
उसे इस पृथ्वी पर लाकर छोड़ दिया
और उसी में अविमुक्त लिंग के रूप में
बन ज्योतिलिंग काशी विश्वनाथ जी उसको नाम दिया
कहते है की द्वारपाल है भगवान भैरो जंहा
वो काशी नगरी है भगवान शिव को बहुत प्यारी
है पाता मुक्ति हर कोई
जो मरता यंहा पर और है इसकी शान न्यारी
जो है करता तपस्या यंहा पर
वो पाशुपत ज्ञान पाता है
छूट जाता है वो जन्म मरण से
वो सदा के लिए मोक्ष पाता है
इसी तरह एक समय में
ऋषि गौतम देवी अहिल्या के साथ
ब्रह्मगिरी पर्वत के पास रहते थे
पड़ा आकाल सूखी धरती
सब प्राणी भूखे प्यासे तडपते मरते जाते थे
की कड़ी तपस्या ऋषि गौतम ने
और वरुण देव से ये वर पाया
नही सूखे जो कभी और भरा रहे जल से
ऐसा कुंड उन्होंने था वर में पाया
तब आई हरयाली उस जगह पर
और सब मनुष्य और पशु पक्षी वंहा आन बसे
पर कुछ समय बाद
अन्य ब्राह्मणों और ऋषि पत्नियों के मन
ऋषि के प्रति इर्ष्या से भर उठे
की उन्होंने तपस्या गणेश जी की
और उनसे ये वर माँगा
की कीजिये कुछ ऐसा
कि ऋषि गौतम जाए वंहा से चले
और हो जाए ये आश्रम हमारा
बड़ा समझाया गणेश जी ने
कि उलटी प्रार्थना मत करो
और स्त्रियों की बात में आकर
ऐसा पाप भरा कार्य मत करो
मगर दुर्भावना वश वो ऋषि नही माने
और प्राकृति के नियम अनुसार
अपनी तपस्या के बदले
भगवान गणेश जी से वो वर पा गये
एक दिन जब ऋषि गौतम
वन में विहार को गये
तब भगवान गणेश जी
वंहा एक दुर्बल गाय बनके आ गये
ज्यो ही ऋषि गौतम ने उन्हें तिनको से हांका
तुरंत ही मरी वो गाय
और गौतम ऋषि के मन को संताप से भर डाला
और पाकर मौका होकर एकत्रित
उन ब्राह्मणों ने ऋषि गौतम को वंहा से निकाल डाला
जब पूछा पश्चाताप उसका
तो पृथ्वी की तीन परिक्रमा,
दस ब्रह्म गिरी पर्वत की परिक्रमा,
गंगा को वंहा लाकर उससे स्नान
और एक करोड़ शिवलिंग का निर्माण करके
उसकी पूजा का विधान बता डाला
तब बनाकर एक करोड़ शिव लिंग
उनकी पूजा उन्होंने कर दी
दस बार की परिक्रमा ब्रह्मगिरी की
और धरती की तीन परिकर्मा भी पूरी कर ली
तब प्रगट हुए प्रभु शिव
और किया प्रगट देवी गंगा को अपने कमंडल के जल से
और कहा ऋषि गौतम को की वर मांगो
तो की प्रार्थना ऋषि गौतम ने कि
मुझे मुक्त कर दो गौ हत्या के पाप से
तो कहा भगवान शिव ने कि
तुमने तो कभी पाप किया ही नही
तुम तो हो निर्दोष क्योंकि
ये तो थी चाल इन दुष्टों की
पर फिर भी कहा गंगा से
तुम अपने जल से ऋषि को स्नान करा दो
और करो कृपा इन पर
और इनकी तपस्या को सफल बना दो
पूछा प्रभु शिव ने उन अन्य ऋषियों के बारे में
तो बोले ऋषि की चलो
इन की वजह से मेने इतनी तपस्या तो कर ली
कर दो आप क्षमा इनको
क्योंकि उस समय द्धवेष ने थी इनकी बुद्धि हर ली
तो कहा भगवान शिव ने गंगा से क्योंकि उस समय द्धवेष ने थी इनकी बुद्धि हर ली
कि कहो इन ऋषि को कि
अपने लिए भी कुछ और मांगो
तो की प्रार्थना ऋषि ने कि
जन कल्याण के लिए आप दोनों यंहा विराजो
मान गये भगवान शिव
और समा वंहा शिव लिंग में
वो त्र्म्बकेश्वर ज्योति लिंग कहलाये
बोली गंगा की में यंहा तभी रह पाऊगी
जब सभी देवता यंहा रह जायेगे
बोले देवता की जब जब आयेगे सूर्य सिंह राशि में
तब तब छोड़ अपना स्थान हम भी यंहा आ जायेगे
होगा विशेष महत्त्व उस समय का
हमे हमारे भक्त तब हमे हमारे धाम में नही पायेंगे
और उस समय हमारे भक्त
हमारी पूजा और दर्शन सिर्फ यंही कर पायेंगे
सुन कर ये सब देवी गंगा वंहा आयी
और इस रूप में वो गौतमी या गोदावरी कहलाई
है त्र्मभकेश्वर की ये महिमा की ये बड़े से बड़े पातक
और यंहा तक की काल सर्प योग का भी नाशक है
पर है उसके लिए ये सार्थक
जो मन से इसका याचक है
रावण था बहुत बलवान पर था शिव भक्त
एक बार उसने कैलाश पर जाकर
बहुत भीषण तपस्या की
गर्मी में आग के सामने,
बरसात में खुले में और सर्दी में पानी में खड़े होकर
कर तप उसने भगवान शिव की आराधना की
पर उसके राक्षसी स्वभाव के कारण
फिर भी जब भगवान शिव प्रसन्नता नही जाहिर की
तब हुआ निराश वो और
अपने शीश प्रभु चरणों में चढाने कि ठान ली
तब उसने एक एक करके अपने नौ सर बली चढ़ा दिए
जब देने लगा दसवा सर भी तब प्रभु शिव प्रगट हुए
माँगा बल रावण ने उनसे
और साथ भगवान शिव को लंका ले चलने की जिद की
है भक्त की भक्ति के प्रभु शिव अधीन
और उन्होंने दिया उसको एक शिव लिंग
और उसकी बात मान ली
पर रखना नही जमीन पर लंका तक
ये शर्त भी साथ लगा दी
अन्यथा जंहा रखोगे
ये शिवलिंग वंही स्थित हो जायेगा
और फिर कोई उसे
और कंही नही ले जा पायेगा
ले चला रावण उस शिव लिंग को रास्ते में उसे
मूत्र की जरूरत ने परेशान किया
बुला एक ग्वाले को पकड़ा वो शिवलिंग
मूत्र करने चल दिया
कुछ समय में ही थक गया ग्वाला
और उसने उस शिव लिंग को वंही पर रख दिया
फिर नही हिला वंही हुआ स्थित वो शिव लिंग
और रावण थककर लंका को चल दिया
और इस तरह शिव लीला का
जग ने गुण गान किया
और उस शिव लिंग को ही
पवित्र बैजनाथ ज्योतिलिंग नाम दिया
हुआ जब रावण अति बलशाली
तो अपनी शक्ति से उसने था सबको हराया
हुए चिंतित देवता रावण की शक्ति से
और उन्होंने नारद को उनके पास भिजवाया
दी नारद ने रावण को सलाह
और करने की परीक्षा अपनी शक्ति की
उसको कैलाश भिजवाया
जाकर देखने को अपनी शक्ति
रावण ने कैलाश को था हिलाया
आया क्रोध प्रभु शिव को
और उसका हाथ कैलाश के नीचे दबाया
और शीघ्र ही तोड़ने को घमंड रावण का
राम अवतार होने का रावण को श्राप सुनाया
इसी तरह राक्षसी दारुका को
देवी पार्वती का वरदान था
जहा चाहती वो ले जाती वो अपने जंगल को
ऐसा उसको वर प्राप्त था
वो आप और अपने पति दारुक के साथ
हर तरफ उत्पात मचाती थी
ऋषि मुनि और धर्मात्मा लोगो को
सदा असुरो से परेशान करवाती थी
तब एक ऋषि ने उसको श्राप दिया
कि नष्ट हो जायेगा उसका वंश
अगर उसने पृथ्वी पर
किसी धर्मात्मा को परेशान किया
बचने को उस श्राप से उसने
उस वन सहित समुन्द्र में प्रस्थान किया
वंहा एक बार एक शिव भक्त व्यपारी को
और उसके दल को उसने पकड़ लिया
और पकड़ कर उन सब को
अपनी कैद में डाल दिया
वो व्यापारी था शिव भक्त
वो वंहा भी शिव भक्ति में ध्यान लगाता था
करता था वो शिव आराधना
और भगवान शिव को सहायता के लिए बुलाता था
एक बार जब राक्षस उसे मारने को आये
तो उसने पूरी आतुरता से
भगवान शिव को पुकार लिया
चले आये शिव
और चुन चुन कर राक्षसों का उन्होंने नाश किया
तब गयी वो राक्षसी दारुका देवी पार्वती की शरण में
और अपने वंश को बचाने के लिए
उनके चरणों को पकड़ लिया
तब गयी भगवान शिव के पास देवी पार्वती
और उस राक्षसी को करने को क्षमा
उन्होंने भगवान शिव से अनुरोध किया
मानकर देवी पार्वती की बात
उन्होंने उस राक्षसी को
परिवार सहित वहां रहने दिया
साथ ही चारो वर्णों के व्यक्तियों को भी
वहां निर्भय होकर रहने का वर दिया
कहकर इतना भगवान शिव और देवी पार्वती ने
वहां शिव लिंग में ही वास किया
और उस जगह को प्रभु शिव और देवी पार्वती
ने नागेश्वर ज्योतिलिंग नाम दिया
इसी तरह की परमात्मा का है
विधान निराला हमने पहले ही बताया था
देवी सती के साथ थे शिव जब
तब उन्होंने भगवान राम (भगवान विष्णु) को शीश नवाया था
जब चले भगवान राम रावण से युद्ध को
तब उन्होंने बनाकर शिव लिंग
समुन्द्र के तट पर प्रभु शिव को
अपना अराध्य बनाया था
वो शिव लिंग ही बन ज्योति लिंग
रामेश्वर ज्योति लिंग कहलाया था
और भगवान शिव का आशीर्वाद पाकर
उन्होंने रावण को हराया था
सुधर्मा नाम का एक ब्राह्मण था
बहुत शिव भक्त हमेशा शिव भक्ति में लीन रहता था
पत्नी थी सुदेहा उसकी
जिसका हमेशा वो साथ पाता था
पर नही था कोई पुत्र उनके
येही दुःख उसकी पत्नी को सताता था
अंत में किया मजबूर सुदेहा ने और
सुधर्मा की दूसरी शादी
अपनी बहन घुश्मा से करवाई थी
समझाया उसको और अपनी बहन घुश्मा से करवाई थी
बना १०१ पार्थिव शिवलिंग कर पूजा
प्रतिदिन जलाशय में विसर्जित करने की
उसने प्रथा बनाई थी
आखिर हुआ पुत्र उनके घर में
और धुश्मा ने बड़ा होने पर उसका विवाह रचाया
पर बदला मन सुदेहा का
और सौत डाह उसके मन में समाया
एक रात सोते हुए पुत्र को
उसने निर्दयता से मार गिराया
किये टुकड़े उसके
और जाकर उसे
जलाशय के पानी में था जा बहाया
अगले दिन जब पता लगा तो
घुश्मा और सुधर्मा ने
नही अपनी प्रथा से मुँह चुराया
की पूजा वैसे ही अपनी
और की अपनी प्रथा पूरी
और भगवान शिव की आराधना से
नही अपना मन फिराया
करके विसर्जन पार्थिव शिव लिंग का
जब घुश्मा ने अपना मुह घुमाया
तो अपने पुत्र को उसने
उस जलाशय में निकट जिन्दा खड़ा पाया
हुए खुश भगवान शिव
और उसको अपना दिव्य रूप का दर्शन करवाया
जब लगे मारने सुदेहा को तो
उसके लिए क्षमा दान मांग
घुश्मा ने था उसको बचाया
अब और प्रसन्न हुए प्रभु शिव और
वही स्थापित हो शिव लिंग में
घुश्मा को अनुग्रहित किया
बना वो शिव लिंग ज्योति लिंग
और घुश्मेश्वर महादेव उसको नाम दिया
एक बार जब असुरो का
पृथ्वी पर अत्याचार बड़ा
और भगवान विष्णु से भी
उसका समाधान नही हो सका
तब भगवान विष्णु ने की पूजा प्रभु शिव की
और १००० कमल के फूल
१००० नाम के साथ चढ़ाने के लिए
भगवान विष्णु ने
कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान किया
पर तभी शिव लीला के तहत
प्रभु शिव ने एक कमल छुपा दिया
जब करते हुए पूजा खोजने पर भी
नही मिला एक कमल
तो भगवान विष्णु ने
अपना नेत्र कमल मान चढ़ा दिया
तब खुश हुए परमात्मा शिव
और उन्होंने वर स्वरूप सुदर्शन चक्र
भगवान विष्णु को प्रदान किया
उस सुदर्शन चक्र से
भगवान विष्णु ने असुरो का काम तमाम किया
और इस अवतार को भगवान विष्णु के
हरीश्वर अवतार का नाम दिया
वैसे तो भगवान शिव के
दस व्रत का जिक्र आता है
पर शिव रात्री का महत्व तो
सब से उपर माना जाता है
जो अनजाने में भी करता है इसे
वो अपने सारे पातक नष्ट कर जाता है
एक व्याघ (शिकारी) था बड़ा दुष्ट
वो मारकर जानवरों को
अपना और अपने परिवार का जीवन चलाता था
मारता था निरीह जानवरों को
और उनका मॉस खाता था
एक बार शिव रात्री के दिन
उसको कोई शिकार न मिला
और थक कर शाम को वो
जलाशय के किनारे
एक बिल के पेड़ पर जा चड़ा
तभी पीने को पानी
एक हिरनी वहा पर आ गयी
देखकर उसे शिकारी के
मुख पर प्रसन्नता छा गयी
ज्योही चढाया बाण उसने
उसे मारने को तभी
कुछ बूंदे पानी की शिवलिंग पर जा गिरी
और साथ ही कुछ पत्तिया बेल पत्र की
नीचे स्थापित शिव लिंग पर जा चढ़ी
और इस तरह अनजाने में ही सही
पर उस व्याघ की
प्रथम पहर की शिवरात्री पूजा सम्पन्न हुई
तभी देखा उस हिरनी ने उपर
और देख शिकारी को वो बेचारी काँप गयी
की प्रार्थना उसने कि
बच्चो को अपने पति को सौंप में वापिस आती हूँ
और सौंपकर इस नाशवर शरीर को तुम्हे,
मिटाकर तुम सब की भूख
मै परोपकार कमाती हूँ
अपने अनजाने में चढाये
उस जल के पुण्य कर्म की वजह से
वो शिकारी मान गया
करके विश्वास उस हिरनी पर
उसने उसे जाने दिया
कुछ देर बाद उस हिरनी की बहन
भी वहा आ गयी
और फिर जब मारने लगा बाण उसको
तब गिरी कुछ बूंदे जल की शिव लिंग पर
और इस तरह उस शिकारी की
दूसरे पहर की पूजा सम्पन्न हुई
फिर देखा उस हिरनी ने उस शिकारी को
और फिर वो भी आने का वादा कर के
वहा से चली गयी
और थोड़ी देर बाद उन का हिरण भी
वहा पर आ गया
और जब फिर चडाया बाण उसे मारने को
तब फिर शिकारी ने कुछ जल
शिव लिंग पर गिरा दिया
इस तरह वो जल अर्पण शिकारी का
तीसरे पहर की पूजा सम्पन्न करा गया
उन तीनो हिरन हिरनी ने
इकट्ठे होकर मिलकर
वायदा निभाने का निश्चय किया
चल पड़े वो तीनो अपने बच्चो सहित
उस शिकारी के पास
और खुद को उसके हवाले किया
और तीन शिकारों को देखकर
उस शिकारी का मन खुश हुआ
और मारे ख़ुशी के फिर
उससे थोडा जल और बेल पत्र
उस शिव लिंग पर समर्पित हुआ
सम्पन्न हुई पूजा चौथे पहर की
और उसके सब पाप धुल गया
छोड़ दिया उन सब हिरनों को
और भगवान शिव का उसने आश्रय लिया
उस शिकारी पर प्रसन्न हुए प्रभु शिव
और उसको अपना आशीर्वाद दिया
उस शिकारी को उन्होंने
गुह नाम और साथ ही ये वरदान दिया
की राज करेगा वो
और जब आयेगे भगवान विष्णु
श्री राम रूप में घर उसके
तब उसका मोक्ष होने का वर भी प्रदान किया
साथ उन हिरनों को भी मोक्ष प्रदान किया
और स्थापित हो वहा पर उस जगह को
व्याघेश्वर लिंग नाम दिया
भक्ति और ज्ञान का बहुत गहरा नाता है ,
ज्ञान बिन भक्ति नही होती
और बिन भक्ति ज्ञान नही आता है
है मुक्ति के विभिन्न रूप -
सारुप्य , सालोक्य, सानिध्य और सायुज्य मुक्ति
और उन सब से उपर जो दे सकते है
सिर्फ प्रभु शिव वो है कैवल्य मुक्ति
इस तरह है भक्ति सगुण और निर्गुण भक्ति,
वैदिक और स्वाभाविक भक्ति,
नैष्ठिक और अनैष्ठिक भक्ति,
होती है नैष्ठिक भक्ति छह किस्म की
और एक किस्म की अनैष्ठिक भक्ति
और इस तरह कुल नौ प्रकार की होती है भक्ति
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चना, वन्दन,
सांख्य और आत्मसमर्पण
इस तरह से होती है भक्ति
निराकार परमात्मा साम्ब सदाशिव से
प्रभु शिव उत्पन्न हुए
और उन्होंने किया उत्पन्न पुरुष
और प्रकृति (स्त्री) जो नीर (जल) में सोए
और नीर में सोने के कारण वो नारायण कहलाये
उनकी नाभि से उत्पन्न हुए जो
और की जिन्होंने सृष्टि की रचना
वो ब्रह्मा कहलाये
जब की तपस्या ब्रह्मा जी ने
तो प्रगट हुए जो वो विष्णु कहलाये
हुआ जब विवाद ब्रह्मा जी और विष्णु जी में
तो प्रगट हुए जो बनके लिंग वो महादेव कहलाये
और जो हुए प्रगट भोंहो में से भगवान ब्रह्मजी की
वो रूद्र कहलाये
ये भगवान रूद्र है साकार रूप प्रभु शिव का
और प्रलय होने पर हर जीव
उनमे लीन हो जाता है
तथा हर प्राणी काल का ग्रास बनकर मृत्यु के बाद
अपने पूज्य देव में विलीन हो जाता है
और सिर्फ प्रलय के बाद ही वो
प्रभु शिव में लीन हो पाता है
जो भजता है प्रभु शिव को वो
बाद मृत्य के तुरंत भगवान रूद्र में लीन हो जाता है
और पाकर कृपा प्रभु शिव की
वो तुरंत वो उनका आशीर्वाद पाता है
प्रलय के समय करके तांडव
और करके सब को खुद में लीन
सिर्फ रूद्र है जो होते है प्रभु शिव में लीन
और प्रलय के बाद
सिर्फ परमात्मा शिव की सत्ता रह जाती है
शिव है अजन्मे और अनन्त जिनके उपर
काल की गति भी कोई नियन्त्रण नही कर पाती है
और इसलिए प्रभु शिव महाकाल
और उनकी शक्ति महा काली कहलाती है
शक्ति है महाकाली वो भी उनकी अर्धांग्नी है,
शिव और शक्ति है एक और अनन्त
ये ही प्राचीन श्रुतियो की वाणी है
शिव है परमात्मा, शिव है बीज, शिव ही है सर्वत्र
और हम सब है अंश परमात्मा शिव का और
जब अंश माया से लिप्त होता है
तब अंहकार से 'मै' बन जाता है
खुद को नही पहचानता शिव के अंश के रूप में
बल्कि अंहकार से युक्त हो जाता है
जैसे शुद्ध सोने में मिलाने से चाँदी या खोट
उसकी कीमत कम हो जाती है
वैसे ही माया से लिप्त होने से 'मै' में बदल जाने से
जीव की कीमत कम हो जाती है
वो शिव का अंश होकर भी शिव नही रहता
और मोह माया में फंस कर
कर्मभोग में बंध जाता है
जैसे बीज से फूटता है अंकुर और वो विभिन्न
शाखाओ, पतियों, फूलो, और फलो में प्रवर्तित हो
आखिर में फिर बीज ही बन जाता है
उसी तरह ये भगवान शिव का अंश
मोह माया के विकारो में बंध कर
बनकर किसी का रिश्तेदार, गरीब, आमिर
और लेकर विभिन्न नाम
आखिर शिव रुपी बीज में ही प्रवर्तित हो जाता है
परमात्मा शिव ही सब को है जानते
और कोई परमात्मा शिव को नही जान पाता है
शिव है सर्वत्र, हर चीज में है शिव
पर फिर भी शिव कंही लिप्त होते नही है
जैसे दीखते है सूर्य देव जल में
परछाई की तरह, देते है उसको ऊष्मा
पर फिर भी वो पानी में होते नही है
प्रभु शिव की भक्ति ही देती है ज्ञान को
और वो कभी ज्ञान नही पाता
जो परमात्मा शिव को मानता नही है
पाना है अगर छुटकारा मोह माया से
तो परमात्मा शिव को मानो
जानना है अगर सत्य तो
शिव तत्व को पहचानो
एक बार भगवान कृष्ण ने भी
की थी तपस्या परमात्मा शिव की
की थी तपस्या क्योंकि
थी इच्छा उनकी एक पुत्र की
और उन्हें स्वयंकर सूर्य देव के रूप में पुत्र प्राप्त हुए
साथ ही साथ माँ शक्ति से अनन्य वर प्राप्त हुए
धरती है मृत्यु लोक
यंहा हर प्राणी कर्मो का भोग भोगने आता है
नही होते खत्म कर्म बिना भोगे
यह ही नियम विधाता का है
अच्छे कर्मो का अच्छा फल
और बुरे कर्मो का बुरा फल
एक दुसरे को भी ये काट नही सकते है,
सिर्फ मानव ही करते है नूतन कर्म
और अन्य जीव नये कर्म बना नही सकते है
परायी स्त्री को पाने का संकल्प,
पराये धन को हडपने का संकल्प,
बुरे कर्म करने का संकल्प,
जीव हिंसा करने का संकल्प,
यह सब मानसिक पाप कहलाते है
पराई निंदा, झूठ बोलना, फालतू बात करना,
पर स्त्री को बहकाने वाली बात करना
ये सब वाचिक पाप कहलाता है
पर स्त्री गमन, जीव हिंसा, पराया धन हडपना,
और किसी को बिना बात के नुक्सान पहचाना
ये शारीरिक पाप कहलाता है
मृत्यु के बाद जाता है प्राणी यम लोक
जंहा का ८६ करोड़ योजन का फासला है
पापी जाता है दक्षिण द्वार से
और पुण्य आत्मा पूर्व द्वार से जाता है
जैसा पाप या पुण्य किया है मानव ने
वैसा ही उसका रास्ता कट जाता है
अन्न, छाता,जूता, शैया, पेड़ ,
जल, दिया(रौशनी) और गाय
ये आठ किस्म के दान का
बहुत महत्व आता है
उत्तम से उत्तमतर है अन्न दान
जो पूर्ण ब्रह्मा कहलाता है
भूखे को अन्न और प्यासे को पानी
देने से पहले कभी उसकी जात मत पूछो
ये है मानव का धर्म
की भूखे की भूख मिटाना
और प्यासे की प्यास बुझाना
कुछ भी हो सकता है पुण्य इससे बेहतर
ऐसी कभी बात न सोचो
एक बार प्रभु शिव ने क्रोधित होकर
कर दिया था अंत काल का
और इसी लिए था पाया
नाम उन्होंने महा काल का
पर बाद में करके भक्ति काल ने
फिर से प्रभु शिव को खुश कर दिया
और चलाने को सृष्टि प्रभु शिव ने
एक बार फिर काल को जीवित कर दिया
देवी पार्वती ने पूछा एक बार कि
काल को जीतने का तरीका है क्या
बोले शिव की पंचभूत का है शरीर
और है पंचभूत यानी पृथ्वी (मिटटी),
वायु, जल, तेज(आग) और आकाश
है आकाश से पैदा होता वायु,
वायु से तेज, तेज से जल,
जल से पृथ्वी और
पृथ्वी के है गुण पांच
-रूप, गंध, स्पर्श,शब्द, स्वाद
जल के है , गंध, स्पर्श, स्वाद, शब्द गुण चार
तेज के है - स्पर्श, शब्द, गंध तीन गुण
वायु के है -गंध और शब्द दो गुण
आकाश का एक गुण- शब्द होता है
शब्द ही आकाश है
और काल को जीतने का उपाय
शब्द को पहचानना ही होता है
शब्द को जानने के लिए योगी पुरुष
रात्री में जगते है
और अपने कान तर्जनी ऊँगली से बंद करते है
तब दो घड़ी के बाद
उनको अग्नि प्रेरित शब्द सुनता है
और इस शब्द से वो
प्रथम सीढ़ी पार करते है
घोष, कांस्य, श्रिंग, घंटा,वीणा,
बांसुरी,दुन्दबी,शंख,मेघ गर्जना
नौ प्रकार से शब्द को योगी जान जाता है
जो इस शब्द भेद को जान जाता है
वो ही योगी कहलाता है
करता है योगी प्राणायाम
और वो मृत्यु को नियंत्रित कर पाता है
प्राणायाम का मतलब है प्राणों का आयाम
यानी की वो प्राणों को हृदय में रोक पाता है
योग से पहचान कर अपने मृत्यु काल को
वो रोककर श्वांस को
अपनी मृत्यु को रोक पाता है
होती है जो वायु हृदय के अंदर
वो ही अग्नि (तेज) को प्रज्वलित करती है
ये अग्नि (तेज) ही जीव के अंदर
जीवन ज्योति संचालित करती है
योगी करता है नियंत्रित
आवागमन को इस वायु के
और वो प्राणायम कहलाता है
इस प्राणायम के बल पर ही योगी
अपनी मृत्यु पर नियन्त्रण पाता है
प्राणायाम में योगी एक सुखद आसन पर बेठकर
एक लम्बी सांस लेकर सांस को रोक ले
फिर जब तक रुके तो रोके
फिर जोर से पेट तक को खाली करके छोड़ दे
एक और क्रिया में
आँख को ऊँगली से बंद कर
कानो को अंगूठे से बंद कर
ध्यान दोनों आँखों के बीच में
केन्द्रित किया जाता है
जो दिखती है
लाल, पीली, हरी, काली, नीली, किरणे
वो ही दिव्य प्रकाश कहलाता है
इस तरह करके प्रभु का ध्यान
एक लम्बी सांस खींच लो
और जब टपके कुछ बूंदे जल की तालू में
तब अंदर खींच कर उसे सूंघ लो
यह जल नही अमृत है
इस सच्चाई को जान लो
है एक और क्रिया की मोड़ कर जीभ को
अंदर की तरफ खींच लो
कुछ समय में ये जाकर
छु लेगी गले की घंटी को
और टपकेगी कुछ बूंदे जल अमृत की
और उन्हें तुम पी लो
इस अमृत को पीकर मनुष्य धन्य हो जाता है
क्योंकि ये साधना ही योगी को महान बनाता है
एक बार एक अत्यंत दानी और लोक प्रिय राजा
थे सुरथ वो शान्ति से अपना राज्य चलाते थे
सुखी थी जनता उनकी पर
उनके शत्रु मारे इर्ष्या के जले जाते थे
इकट्ठे हो उन शत्रु यो ने उनपर आक्रमण किया
और हराकर उन राजा सुरथ को
उनका राज्य छीन लिया
हुए दुश्मन उनके अपने ही मंत्री
और उन्होंने उनको दगा किया
और हो निराश राजा ने
गहन जंगल में
एक मुनि के आश्रम में आश्रय लिया
इसी तरह एक वैश्य को
उसके ही पुत्रो और पत्नी ने धोखा दिया
छीन कर धन सारा उसका
घर से उसे निकाल दिया
और होकर दुखी उस वैश्य ने भी
मुनि के आश्रम में आश्रय लिया
एक दिन होकर दुखी वो दोनों बैठे थे
और एक दुसरे को अपने दिल का हाल सुनते थे
खाकर भी इतने धोखे वो
क्यों पिछला भूल नही पाते है
और जानने को कारण इसका
वो ऋषि के पास जाते है
महा माया की माया ही है कारण इसकी
और सिर्फ महा माया की कृपा से ही
मानव इससे बच पाते है
और महा माया ही है कारण इसकी
ये ऋषि उनको बताते है
शक्ति है शिव और शिव ही शक्ति है,
शक्ति के द्वारा ही शिव ब्रह्माण्ड चलाते है
चूंकि शक्ति है प्रकृति है, शक्ति ही नारी है
और शक्ति की माया ही न्यारी है
और ये सारी सृष्टि ही है महा माया की
माया और माया ही सबको प्यारी है
ये औरत है माया
ये विद्धवानो ने बताया है
औरत है माँ के रूप में छाया
बाकी तो सब माया है
जब महाप्रलय के बाद
भगवान विष्णु नीर(जल) में
अपनी शेष नाग की शय्या पर सोये थे
तभी उनके कान के मैल से दो दैत्य
मधु और कैटभ प्रगट होए थे
जब उन्होंने नाभि में भगवान विष्णु की
बैठे हुए ब्रह्मा जो को वंहा पर देखा था
वो दैत्य थे विशाल
और देख भगवान ब्रह्मा जी को
उन्हें खाने का सोचा था
देख सोया भगवान नारायण को
भगवान ब्रह्मा बहुत घबराए
करा याद देवी आदिशक्ति को कि
आप ही प्रगट हो और नारायण को जगाए
और कृपया इन विकराल दैत्यों से मुझे बचाए
तब हुई प्रगट देवी आदि शक्ति
और भगवान नारायण को उन्होंने जगाया
जागे भगवान विष्णु और उन दैत्यों से
पांच हजार वर्ष तक युद्ध करके
उनसे ही ये वर पाया
की उन दैत्यों का अंत ऐसी जगह पर होगा
जंहा न धरती होगी और न ही जल होगा
तब रख कर सर उन दैत्यों का अपनी जांघ पर
प्रभु नारायण ने उन दैत्यों को मार गिराया था
वो प्रगट हुआ रूप देवी आदि शक्ति का
महा काली रूप वो माँ का कहलाया था
आदि शक्ति ने लिए रूप अनेक,
है महा लक्ष्मी उनमे से एक
एक बार जब महिषासुर नामक असुर ने
कर देवताओ को पराजित
त्रिलोकी पर अपना राज्य कायम कर लिया
हुए त्रस्त देवता
और भगवान ब्रह्मा जी के साथ जाकर
भगवान शिव और भगवान विष्णु से
महिषासुर के नाश का आग्रह किया
तब हो क्रोधित भगवान विष्णु
और भगवान शिव ने
आदि शक्ति का आह्वान किया
हुई प्रगट देवी महालक्ष्मी
और भगवान विष्णु, शिव, ब्रह्मा, और देवताओ ने
अपने अपने अस्त्रों से उन्हें सुशोभित किया
तब किया माँ ने अट्टहास
और महिषासुर को युद्ध के लिए आमंत्रित किया
हुआ युद्ध और महिषासुर को
अपने चरणों में दबाकर
त्रिशूल उसके गले में गाड दिया
उस अधमरे शरीर में से
मायारूप से महिषासुर ने
निकलने का प्रयत्न किया
पर काट सर उसका माँ ने
उस पापी दुष्ट असुर का अंत किया
ये रूप माँ का बच्चो को निर्भय बनता है
और येही रूप माँ का
महालक्ष्मी रूप कहलाता है
जो करता है पूजा इस रूप की
वो मानव धन्य हो जाता है
शुम्भ और निशुम्भ दो असुर हुए,
उन दोनों ने हराया देवताओ को
और त्रिलोकी के वो मालिक बने
हारकर देवता माँ गौरी की शरण में गए,
की प्रार्थना उन्होंने कि
माँ गौरी की त्वचा से देवी सरस्वती को प्रकट करे
तब माँ की त्वचा से माँ एक और रूप में आई
और माँ की कोशिकाओ से
जन्म ले कर वो कौशक्की कहलाई
क्योंकि उत्पन्न हुई थी माँ के अंग से
इसलिए मातंगी भी कहलाई
मारने को शुम्भ, निशुम्भ को ये लीला रचाई
की हराएगा जो उन्हें युद्ध में
करेगी वो शादी उससे ऐसी कसम उन्होंने खाई
चला जब पता शुम्भ को माँ की सुन्दरता का
तो उसने अपने असुर योद्धाओ के हाथ
विवाह का संदेश भेज दिया
मगर माँ ने अपनी कसम की बात बता कर
उन्हें वापिस भेज दिया
क्रोधित हो शुम्भ ने
असुर चंड और मुंड को
युद्ध के लिए भेज दिया
और युद्ध में माँ ने मारकर उन्हें
उन सब का संहार किया
लगा पता जब शुम्भ निशुम्भ को
तो वो ले सेना युद्ध के लिए आ गये
हुआ युद्ध भयंकर और पहले निशुम्भ
फिर शुम्भ दोनों माँ के हाथो मृत्यु पा गये
शिव और शक्ति है एक
पर दोनों भिन्न -भिन्न रूप धरते है
जब भी करता है अभिमान कोई तो
ये करके अपनी लीला उसका अभिमान हरते है
एक बार देवताओ ने हराया दैत्यों को
और वो पाताल लोक में भाग गये
और अभिमान में भरकर देवता
अपने ही स्तुति गान में भरमा गये
तोड़ने को अभिमान उनका
माँ शक्ति एक शक्ति पुंज उमा के रूप में प्रगट हुई
और जब देखा उनको तो कौन है ये
यह जानने की इच्छा देवताओ में प्रबल हुई
भेजा देव राज इंद्र ने प्रथम वायु देव को
और पूछा वायु देव से माँ देवी ने की कौन है आप
मै हूँ वायु देव और
मै बसता हूँ हर जीव में बनकर प्राण
दिया एक तिनका और
कहा देवी ने की इसको उड़ा दो
और अपनी बात को सिद्ध करने का प्रमाण दो
जब नही उड़ा पाए उस तिनके को
तो वायु देव घबरा गये
और वो सीधे देव राज इंद्र के पास आ गये
सुना जब ये तो एक एक करके
अपने हरेक देवता को भेज दिया
और हरेक ने आजमाई अपनी शक्ति पर
देवी माँ ने हरेक को
करके शर्मिंदा वापिस भेज दिया
आखिर देव राज इंद्र
खुद गये देखने उनको होकर हैरान,
पर हो गयी देवी शक्ति देख उनको
उनके सामने ही अंतर ध्यान
होकर हैरान देव राज इंद्र ने
माँ शक्ति की आराधना और स्तुति गान किया
हुई प्रगट देवी
और उनको अपना दर्शन दिया
और होकर प्रसन्न देव राज इंद्र को
वरदान मांगने को कहा
बोले देव राज इंद्र की माँ शक्ति स्वरूप
मुझ बालक को देवताओ सहित ये वर दो
की भविष्य में लगे रहे आपकी भक्ति में
और कभी न हमको घमंड हो
माँ ने ये वर देकर उन देवताओ को कृतार्थ किया,
और सदा के लिए उनका अभिमान को हर लिया
माँ बच्चो की तकलीफ से हमेशा दुखी हो जाती है
और करने को दुःख दूर उनके दौड़ी चली आती है
एक बार दुर्गम असुर ने
चारो वेदों का अपहरण किया,
हरा कर देवताओ को
तीनो लोको पर कब्जा किया
लुप्त होने से वेद के धर्मिक अनुष्ठान सब बंद हुए,
अधर्म का था बोल बाला
और असुर बहुत प्रबल हुए
तब माँ महा माया अत्यंत क्रोधित हुई
और होकर क्रोधित वर्षा वृष्टि धरती पर रुक गयी
न होने से वर्षा धरती से जल सूख गया
और भूख और प्यास से जीव हरेक
हाहाकार करने लगा
तब देवताओ ने की प्रार्थना
और माँ का आह्वान किया,
हुई प्रगट माँ लिए हुए सहस्त्रो आँखे
और देवताओ का दुःख दर्द सुना
देख कर दुःख प्राणियों का
माँ का ह्रदय द्रवित हुआ
और बहने लगे आंसू उनसे
और उन आँसुयो से हर तरफ जल व्याप्त हुआ
उन हजारो आँखों के कारण
माँ शात्म्बरी भी कहलाती है,
और क्योंकि जल से उनके आँसुयो से
पैदा हुए शाक पते हर तरफ
इसलिए शाकम्भरी नाम से भी जानी जाती है
फिर पुछा देवताओ से कि
उन्हें और क्या चाहिये
तो की प्रार्थना उन्होंने कि
करके अंत दुर्गम का
वेद उन्हें वापिस ला दीजिये
सुन प्रार्थना उनकी माँ ने अपनी शक्तिया-
काली, भैरवी, मातंगी, तारा,
बगुला,भुवनेश्वरी,श्री विद्या, कोशिका,
धूमा,छिन्न मस्तिका,
आदि हजारो शक्तिया प्रगट की
और हुआ भीषण युद्ध
और अंत में अपने त्रिशूल से
दुर्गम असुर को मौत की नींद दे दी
मारकर दुर्गम को वेदों को
उन्होंने देवताओ को वापिस समर्पित किया
और इसीलिए माँ को एक और नाम
माँ दुर्गा अर्पित किया
माँ उमा ही है प्रकृति, माँ उमा ही है माया
और की भक्ति सच्चे मन से जिसने
उसने ही है माँ को पाया
माँ को पाने के योग के तीन रास्ते है
जो क्रिया योग, भक्ति योग
और ज्ञान योग कहलाते है,
क्रिया योग है रूप कर्म का,
अच्छे कर्मो से भक्ति जागती है
और बाद भक्ति के
ज्ञान की होती प्राप्ति है
भजते है जो देवी माँ का नाम
वो ही इस रास्ते पर जा पाते है
अच्छे कर्म से भक्ति,
भक्ति से ज्ञान और
ज्ञान से मोक्ष वो पाते है
एक बार रथव्न्तर कल्प के आरम्भ में
जब वाम देव ऋषि रूप में पैदा हुए
पैदा होते ही वो ज्ञानी हुए
तब एक बार वो भगवान स्कन्द के पास गये
की उनकी स्तुति और आराधना
और भगवान स्कन्द(कार्तिकेय)उनसे प्रसन्न हुए
कार्तिकेय जी की कथा निराली है ,
भगवान शिव और पार्वती के है वो पुत्र
और उनके जन्म से लेकर उनके पालने तक
हर बात में एक कहानी है
भगवान शंकर के वीर्य को
गंगा जी द्वारा ग्रहण करने से
और छह कर्तिकयो द्वारा पालने से
भगवान कार्तिकेय ने ये नाम पाया
करने को संग्राम असुरो से
देवताओ ने उन्हें अपना सेनापति बनाया
हराकर असुरो को उन्होंने
देवताओ को उनका सम्मान वापिस दिलवाया
उन भगवान कार्तिकेय से
ऋषि वाम देव ने जब पूछा
समष्टि-व्यष्टि रुपी ॐ का रहस्य
तो भगवान कार्तिकेय ने था उन्हें ये समझाया
कि ॐ है प्रणव ॐ है प्रथम नाद
ॐ है पूर्ण परमात्मा, पंच मन्त्र उनका शरीर है,
ईशान है उनका मस्तष्क,
तत्पुरुष उनका मुख है,
अघोर उनका ह्रदय है,
वामदेव उनका गुहा प्रदेश है
और सधोजात उनके पैर है
पंच कलाऐ-निरवृति कला, प्रतिष्ठा कला,
विद्या कला, शांति कला
और शांतियता कला उनकी इंद्रिय है,
है परमात्मा सब जगह
पर फिर भी वो कंही पर भोक्ता नही है,
है तीन रूप उनके
स्थूल सूक्ष्म और परे
वो निराकार और साकार दोनो रूप में ही है
उनसे उत्पन्न आकाश में गुण शब्द का है,
शब्द में वो परमात्मा है मौजूद
पर वो शब्द को ये मालूम नही है,
इसतरह वो शब्द में होकर भी वंहा नही है,
इसी तरह है मौजूद वो वायु के
शब्द और स्पर्श रूप में पर
वायु को ये मालूम नही है,
वैसे ही है वो मौजूद
शब्द, स्पर्श और रूप गुण में तेज के
पर तेज को ये मालूम नही है,
है मौजूद वो
शब्द, स्पर्श, रूप और स्वाद रूप में जल में
पर जल को ये मालूम नही है,
और मौजूद है वो
शब्द, स्पर्श, रूप, स्वाद और गंध रूप में पृथ्वी में
पर पृथ्वी को ये मालूम नही है
ये पंच भूत का प्रपंच ही सृष्टि बनाता है
और माया का ये विस्तार ही प्रपंच कहलाता है
जैसे की सूर्य की परछाई ही
कर देती है गर्म जल को
जब की सूर्य वंहा मौजूद नही है
वैसे ही है परमात्मा सब जगह पर
फिर भी वो किसी वस्तु का भोक्ता नही है
है निकले सब गुण उसमे से ही
पर फिर भी वो कहलाता निर्गुण ही है
है निकलता परमात्मा में से पहला अक्षर ॐ
और उससे होता है उत्पन्न महत्त्व
जिसके की तीन गुण -
तामसिक, राजसी और सात्विक है,
तामसिक गुण से होता है उत्पन्न अंहकार,
राजसी से पांच तन्मात्रा
और उनसे पंच भूत और
सात्विक से देवता उत्पन्न होते है
राजसी से जो उत्पन्न होते है पंचभूत
जिनसे की है स्थूल रूप उनका
और उनसे सब सगुण वस्तुए बनी है,
है मौजूद जीव आत्मा रूप में
सूक्ष्म रूप में मौजूद अंश परमात्मा का
और उनका सूक्ष्म रूप ये ही है
ये पंचभूत की बनी सृष्टि है
समष्टि रूप और व्यष्टि रूप में
परमात्मा(स्थूल और सूक्ष्म से परे)हर कंही है
है एक ही शरीर में मौजूद तीनो
प्रथम है स्थूल-भोग्य शरीर जिसमे मौजूद
ये सूक्ष्म जीव आत्मा भोक्ता बनी है
है आत्मा जो की है पूर्ण परमात्मा
जो की सिर्फ भोक्ता के कर्मो की साक्षी बनी है
होता है कार्य भोक्ता का कि
वो भोग्य शरीर को निष्काम भाव से भोगे,
है सुख भी उसके और दुःख भी उसके
हो जो भी वो कर्म
वो उस परमात्मा को अर्पित कर दे
रह नही जायेगा जब जीव का
अपना कोई भी कर्म उसका अपना
तो वो जीव कंहा रह जायेगा
रहकर भी वो इस सृष्टि में
परमात्मा का रूप बन जायेगा
है मानव तुझ पर ऋण तीन
प्रथम है ऋषि ऋण जिसे कि
तुझे ब्रह्मचर्य से चुकाना है
है दूसरा देव ऋण तो कि यज्ञ करके चुकाना है,
है तीसरा ऋण पितरो का
जिसे कि सन्तान उत्पन्न करके चुकाना है,
चुकाकर तीनो ऋण मानव
तुझे वानप्रस्थ आश्रम में चले जाना है
करना है योग के द्वारा अभ्यास
समझने को दुःख, सुख, पीड़ा
और आनन्द को एक समान
और फिर करके नंदी श्राद अपना
सन्यास में जाकर
प्रभु को पूर्ण समर्पित हो जाना है
है पांच भाग ॐ के जो
परमात्मा का अक्षर होने का एहसास कराता है
हुआ सर्वप्रथम उत्पन्न परमात्मा से ये अक्षर
ये हमको एहसास दिलाता है
अ,ऊ, म, बिंदु है ओंकार (ॐ) के चार वयष्टि रूप
और अर्ध चन्द्राकार नाद है समष्टि रूप
और है छह अंग प्रणव के
और छह ही है कृत्य परमात्मा के
और ये चक्र ही अनुग्रह चक्र कहलाता है
प्रथम भाग में अनुग्रह चक्र के
कार्य प्रभु शिव के
सृष्टि,पालन, संहार,तिरोभाव और अनुग्रह आते है
है दूसरा भाग मुक्ति या मोक्ष
जो देते है सिर्फ परमात्मा शिव
और वो इन सब के बाद आते है
और ये छह कार्यो का दो भाग का चक्र
ही अनुग्रह चक्र कहलाता है
प्रथम चक्र में है प्रथम पांच कार्य
और दुसरे भाग में सिर्फ मुक्ति आता है
जो करते है परमात्मा शिव
और ये चक्र ही अनुग्रह चक्र कहलाता है
ये ही है छह अंग प्रणव के
इसी लिए ये मूल मन्त्र कहलाता है
होते है छह ही प्रकार प्रणव (ॐ) के -मन्त्र
रूप, यंत्र रूप, देवता रूप,प्रपंच रूप, गुरु रूप, शिष्य रूप
है पूरी सृष्टि स्थापित इनसे
और ये है प्रणव के छह रूप
मैथुनी सृष्टि के हर जीव के होते है
आदि के तीन कोष माता के
और अंत के तीन कोष पिता के होते है
प्रणव या परमात्मा के तीन भाग-
सत, चित और आनन्द होते है
सत रूप है पुरुष का, चित प्रकृति है
और इन दोनों का मिलन ही
आनन्द यानी परमात्मा बन जाता है
है सत का मतलब दूर होना
असत के प्रपंच का
और है चित का मतलब प्रकाश ज्ञान का
और इन दोनों का मिलन ही
परमानन्द कहलाता है
मैथुनी सृष्टि के आरम्भ में
परमात्मा बीज रूप में सिथत होते है
और उनसे पुरुष और प्राकृति निकलते है
और पूरे ब्रह्माण्ड का विस्तार करते है
इस मैथुनी सृष्टि यानी
प्रकृति की माया की है पांच शक्तिया
-चिच शक्ति, आनन्द शक्ति, इच्छा शक्ति,
विद्या शक्ति और ज्ञान शक्ति
सम्पूर्ण जीवो को अपनी शक्तियों से
आच्छदित करती है ये प्रकृति
और जीव जो परमात्मा शिव का ही अंश है
खुद को परमात्मा शिव से अलग मान लेता है
अपने में कर्ता होने के अहंकार का बंधन ही
जीव को पशु बना देता है
है पशु का मतलब बंधा हुआ पाशो से
चाहे हो जो भी जीव की योनी
चाहे वो स्थावर या हो जंघम,
हो मानव हो या अन्य कोई और
पर सूक्ष्मतर जीव से लेकर
देवताओ सहित सब को
माया का पाश पशु कहला देता है
है पशुपति परमात्मा शिव
जो अपनी आदि शक्ति प्राकृति के द्वारा
सब जीवो को माया के बन्धनों से बांधे रखते है
और इन बन्धनों में बंधे जीव खुद को
परमात्मा शिव से अलग समझ लेते है
है परमात्मा शिव की महेश्वर रूप में
तीन दृष्टिया; ज्ञान, क्रिया और इच्छा
होता है जब पैदा जीव तो परमात्मा शिव की
ये तीन दृष्टिया उसमे वास कर जाती है
बस थोडा ज्ञान और बाकी का माया जाल
इन्द्रियों क्रिया द्वारा
अपने आस पास खुद बिछा लेती है
दिया है ज्ञान हर जीव को कि
हंसना नही रोना है लगने पर भूख
बाकी होकर इच्छा रुपी मोह माया में लिप्त
रोना हर आकर्षित वस्तु के लिए
ये आदत वो मानव खुद में खुद बना लेता है
और इस माया प्रपंच को वो खुद ही अपना लेता है
है पांच प्रमाण परमात्मा की सत्ता के
वो है : प्रतिज्ञा, हेतू , उदाहरण , उपमय और निगमन
हर वस्तु के होने का अहसास होता है
जैसे के पृथ्वी है इसका है एहसास हमे
हर वस्तु के होने का कोई रास्ता होता है
और हर वस्तु होती है पैदा किसी कार्य से
और हर कार्य को करने का कोई कारण होता है
और वो होता है किसी कर्ता से
और वो कर्ता है परमात्मा
जो की चलाता ब्रह्मांड अपनी शक्ति से
है प्रणव में नाद रूप चिच शक्ति का
और बिंदु है रूप आनन्द शक्ति का
म बताता है इच्छा शक्ति को
और ऊ विद्या शक्ति को बतलाता है
अ दर्शाता है ज्ञान शक्ति को
और इस तरह पूर्ण ॐ बन जाता है
है इस तरह निकलते ॐ से
पांच स्वर और ३३ व्यंजन
और इन अड़तीस अक्षरों का समूह ही
भाषा में व्यक्त हो जाता है
ईशान से होती है उपन्न शंतियता कला,
तत्पुरुष से शान्ति कला उपजती ;है
अघोर से उत्पन्न होती है विद्या कला,
वामदेव से प्रतिष्ठा कला आती है
होती है स्धौजात से निर्वृति कला
ये कलाए ही पंच कला कहलाती है
प्रथम जब बीज आता है सम्पर्क में
पंचभूत यानी मिटटी,वायु, जल, तेज
और आकाश के
तब वो बडकर पेड़ बन जाता है
टहनिया होती है विकार उसकी,
पतिया होती है इन्द्रिया उसकी
और माया जाल में लिपटा
धूप, गर्मी, सर्दी सहता है
और इस पंच कलात्मक संसार का
सुख, दुःख भोगता
अंत में फिर बीज रूप में प्रवर्तित हो जाता है
जब ईशान(सबसे प्रथम पुरुष) होता है
सयुंक्त चिच्छ शक्ति( कला) से
तो मैथुनी शक्ति का प्रदुर्भाव हो जाता है
प्रथम होकर चैतन्य थोडा ज्ञान से
और थोड़ी चिच्छ शक्ति पाता है,
आती है उससे थोड़ी क्रिया उसमे
और उससे आसक्ति की और जाता है
जो पैदा करती है राग को
और बार-बार जीना
और बार-बार मरना उसकी नियति बन जाता है
ये जीवन मरण का चक्र ही
पंच चक्र बनकर मनुष्य को
पतन की और ले जाता है
है परमात्मा शिव की पांच शक्तिया- सर्वक्र्क्तव् रूपा,
सर्वत्व रूपा, पुराण तत्व रूपा, नित्य रूपा
और व्यापक तत्व रूपा
ये ही सृष्टि के आदि माता है
और जो खुद को
और सम्पूर्ण ब्रह्मांड में प्रभु शिव को देखता है
बस एक शिव रूप में वो शिव तत्व को जान जाता है
जंहा होता है ज्ञान और क्रिया बराबर
वो विद्या तत्व कहलाता है,
जंहा होती है क्रिया ज्ञान से अधिक
वो आदि शक्ति तत्व कहलाता है
और जंहा होता है ज्ञान क्रिया से अधिक
वो सदा शिव तत्व कहलाता है
जो मानकर खुद को शिव का अंश
और सम्पूर्ण ब्रह्मांड को शिव रूप समझकर
अपना सब कुछ
परमात्मा शिव को सम्पूर्ण समर्पित कर
खुद शिव का अंश समझ जाता है
हो जाता है वो मुक्त जीवन मरण से
और वो अंत में मोक्ष पा जाता है
तत्पुरुष से शान्ति कला उपजती ;है
अघोर से उत्पन्न होती है विद्या कला,
वामदेव से प्रतिष्ठा कला आती है
होती है स्धौजात से निर्वृति कला
ये कलाए ही पंच कला कहलाती है
प्रथम जब बीज आता है सम्पर्क में
पंचभूत यानी मिटटी,वायु, जल, तेज
और आकाश के
तब वो बडकर पेड़ बन जाता है
टहनिया होती है विकार उसकी,
पतिया होती है इन्द्रिया उसकी
और माया जाल में लिपटा
धूप, गर्मी, सर्दी सहता है
और इस पंच कलात्मक संसार का
सुख, दुःख भोगता
अंत में फिर बीज रूप में प्रवर्तित हो जाता है
जब ईशान(सबसे प्रथम पुरुष) होता है
सयुंक्त चिच्छ शक्ति( कला) से
तो मैथुनी शक्ति का प्रदुर्भाव हो जाता है
प्रथम होकर चैतन्य थोडा ज्ञान से
और थोड़ी चिच्छ शक्ति पाता है,
आती है उससे थोड़ी क्रिया उसमे
और उससे आसक्ति की और जाता है
जो पैदा करती है राग को
और बार-बार जीना
और बार-बार मरना उसकी नियति बन जाता है
ये जीवन मरण का चक्र ही
पंच चक्र बनकर मनुष्य को
पतन की और ले जाता है
है परमात्मा शिव की पांच शक्तिया- सर्वक्र्क्तव् रूपा,
सर्वत्व रूपा, पुराण तत्व रूपा, नित्य रूपा
और व्यापक तत्व रूपा
ये ही सृष्टि के आदि माता है
और जो खुद को
और सम्पूर्ण ब्रह्मांड में प्रभु शिव को देखता है
बस एक शिव रूप में वो शिव तत्व को जान जाता है
जंहा होता है ज्ञान और क्रिया बराबर
वो विद्या तत्व कहलाता है,
जंहा होती है क्रिया ज्ञान से अधिक
वो आदि शक्ति तत्व कहलाता है
और जंहा होता है ज्ञान क्रिया से अधिक
वो सदा शिव तत्व कहलाता है
जो मानकर खुद को शिव का अंश
और सम्पूर्ण ब्रह्मांड को शिव रूप समझकर
अपना सब कुछ
परमात्मा शिव को सम्पूर्ण समर्पित कर
खुद शिव का अंश समझ जाता है
हो जाता है वो मुक्त जीवन मरण से
और वो अंत में मोक्ष पा जाता है
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